सुभाष राज

नई दिल्ली. मेरठ के रिमाउंट वेटरनरी कोर सेंटर (आरवीसी) में ऐसे सैनिक बनाए जाते हैं जो गोलियां नहीं चलाते बल्कि भौंकते हैं और दुश्मनों की बोटियां भी काटकर चबा लेते हैं. यहां से ट्रेनिंग पाकर निकला हर सैनिक आतंकवाद, नशीले पदार्थों और प्राकृतिक आपदाओं के खिलाफ देश के लिए काम करता है. बिल्कुल सही समझा आपने ये भारत की सेना का वह ट्रेनिंग सेंटर है, जहां दुनिया के जंगली कुत्तों को बेहतरीन खोजी डॉग में बदला जाता है. ये डॉग इतने खास हैं कि इन्हें ड्यूटी पर भेजने से पहले इनका तापमान जरा भी ज्यादा दिखता है तो डॉग को ड्यूटी के स्थान पर अस्पताल भेजा जाता है.

आरवीसी सेंटर पुणे में राष्ट्रीय रक्षा अकादमी की तरह ट्रेनी को कठोर, नियमित इंस्ट्रक्शन्स में रखता है. नियंत्रित ब्रीडिंग से लेकर पपी एप्टीट्यूड टेस्ट तक सेना के कमीशन प्राप्त अधिकारी उन पर नजर रखते हैं. भारतीय सेना ने श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल, म्यांमार, कंबोडिया और दक्षिण अफ्रीका सहित कई मित्र देशों को इन कैनाइन सैनिकों को उपहार में दिया है. आरवीसी सेंटर कुत्तों से भरा हुआ है. यहां कुत्तों को 9 से 5 बजे तक की मेहनतकश जिंदगी जीनी पड़ती है. ट्रेनिंग काफी विशिष्ट और एलीट होती है. सेंटर कुत्तों के स्वास्थ्य और भलाई को पहली प्राथमिकता देता है. खनन, विस्फोटक और नशीले पदार्थों का पता लगाने में डॉग को पारंगत बनाया जाता है. कुत्तों को ब्रीड कराने, पालने और प्रशिक्षित करने का काम मेजर स्तर के अधिकारी करते हैं.

डिटेक्शन की सबसे ज्यादा डिमांड
कुत्तों को विस्फोटकों, खानों और नशीले पदार्थों का पता लगाने के लिए ट्रेन्ड किया जाता है. लैब्राडोर नस्ल के कुत्तों की सूंघने की बेहतर क्षमता, सीखने के लिए दिमाग और लोगों के साथ फ्रेंडली व्यवहार जैसी खासियतें उन्हें इस काम के लिए परफेक्ट बनाती हैं. सेना लैब्राडोर और बेल्जियम मालिंस के अलावा, जर्मन शेफर्ड को भी पैदल सेना की गश्त और गार्ड ड्यूटी जैसे सुरक्षा के कामों के लिए प्रशिक्षण देती है. भारतीय नस्लों के मुधोल हाउंड, चिप्पीपराई, कोम्बाई और राजपालयम सहित स्वदेशी कुत्तों को भी ट्रेंड किया जाता है.

रोजाना सुबह 4 से 5 किलोमीटर की दौड़
डॉग रोजाना सुबह 4 से 5 किलोमीटर की दौड़ लगाते हैं. दिन का पहला ट्रेनिंग सेशन शुरू करने से पहले उनका तापमान मापा जाता है. इसके बाद उनके तैयार होने और खाने का समय आता है. आरवीसी सेंटर में कई कुत्ते हैं जो सिर्फ ब्रीड करने के लिए हैं और बड़े ध्यान से उनकी देखभाल की जाती है. उनके क्वार्टर के बाहर ट्रेडमिल लगे हैं जिस पर वे एक्सरसाइज करते हैं. उनके घर के आस-पास घूमने और खेलने के लिए काफी खाली जगह होती है. पैदा हुए पिल्ले जैसे ही छह महीने के होते हैं, उन्हें सेना में शामिल कर लिया जाता है.

उनके शरीर में माइक्रोचिप लगाया जाता है और बेसिक ट्रेनिंग शुरू करने से पहले उनके बाएं कान पर उनके यूनिट नंबर टैटू किए जाते हैं. एक कुत्ते के अच्छा काम करने के बाद हैंडलर उन्हें ‘शाबाश’ या ‘गुड डॉग’ कहने के साथ ही खाने में बिस्कुट से लेकर पनीर और मांस भी देता है. छह महीने के पिल्ले को बेसिक ओबेडिएंस ट्रेनिंग दी जाती है. चीजों को फिर से खोजने, आदेशों का पालन करने की क्षमता देखने के साथ ही अन्य तरह से भी परखा जाता है.

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