सुभाष राज
नई दिल्ली. देश में एक सवाल पूछा जा रहा है कि भाजपा ने हैदराबाद नगर निगम को जीतने के लिए देश की चुनावी जंग जीतने वाले चाणक्य को मैदान में क्यों उतारा है? इस सवाल का जवाब पाने के लिए बैचेन, भारत के मन में ये जिज्ञासा भी है कि जिस असदुद्दीन ओवैसी को उत्तर भारत के चुनावी रण में उतारकर मुसलमान वोटों पर आश्रित राजनीतिक दलों को पटखनी दिलाने के पीछे भाजपा का हाथ बताया जा रहा है, वह उसी ओवैसी के गढ़ को क्यों फतह करना चाहती है?

देश हैरान है कि एक नगर निगम चुनाव जीतने के लिए भाजपा का सबसे बेहतरीन चुनावी दिमाग जंगे-मैदान में उतारा गया है! गांव देहात में बैठा भाजपा का कार्यकर्ता भी अचम्भित है कि विश्व की सबसे बड़ी पार्टी होने के दम्भ से ओतप्रोत उसका केन्द्रीय नेतृत्व वहां डेरा डालने पहुंचा है! आखिर क्यों एक राज्य की राजधानी में सीवर लाइन और जलापूर्ति इत्यादि के काम करने वाले एक ​स्थानीय निकाय में जीत को देश पर राज कर रही पार्टी ने प्रति​ष्ठा का प्रश्न बना लिया है?

इन सवालों का जवाब पार्टी के चुनाव प्रचारकों के शब्दबाणों में छुपा है। पार्टी के नेता हैदराबाद में उन ‘जिन्ना’ को याद कर रहे हैं जिन्हें बंटवारे का मुख्य अपराधी माना जाता है। वे बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक का हवाला भी दे रहे हैं। एक समुदाय के प्रति आग उगलने के लिए प्रसिद्ध हिन्दुत्व के ‘पोस्टर ब्वॉय’ को खासतौर पर भाषणों के लिए बुलाया गया है। दूसरे शब्दों में कहें तो पश्चिम बंगाल में अगले साल उतरने के लिए तैयार की गई टीम को ही हैदराबाद में भगवा फहराने का लक्ष्य दिया गया है।

भाजपा ​विशेषज्ञ इसे तेलंगाना में पैर पसारने की पार्टी की आकांक्षा को पूरा करने का पहला पडाव बता रहे हैं लेकिन असलियत में यह गुजरात से शुरू हुए भगवाकरण की राह का अंतिम रोडा है। विभाजन के वक्त जम्मू-कश्मीर के बाद हैदराबाद ही ऐसी रियासत थी जिसे सैनिक ताकत के बल पर ही भारत में रखा जा सका था। गुजरात के जूनागढ़ में यह नौबत आने से पहले तिरंगा फहरा दिया गया था। तत्कालीन हैदराबाद निजाम और उपप्रधानमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल के बीच हुए शह और मात के खेल में निजाम को मुंह की खानी पड़ी। हैदराबाद तब से ही एक खास समुदाय आधारित शहर है।

दक्खिनी हिंदी का खुलकर प्रयोग करने वाले सभी समुदायों के बीच यद्यपि खासा सद्भाव है लेकिन निजाम प्रकरण देश में यदा-कदा चर्चा में आ ही जाता है। राजनेता जैसे ही सरदार पटेल का जिक्र करते हैं तो अवाम को जम्मू-कश्मीर और निजाम जरूर याद आ जाते हैं। लम्बे समय से यह प्रयास किया जा रहा है कि निजाम से जुड़े इस शहर में उसी फार्मूले को दोहराया जाए जिसे पहले उत्तरप्रदेश और अब पश्चिम बंगाल में आजमाने की तैयारी है।

इस फार्मूले के लिए आवश्यक दुश्मन का इंतजाम वहां निजाम काल से ही है। उसका नाम है असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन (एआईएमआईएम)। इस पार्टी का वजूद हैदराबाद विजय के समय से है और उस पर हिंसा में लिप्त होने समेत कई तरह के आरोप हैं। ऐतिहासिक रूप से देखें तो मुगलिया सल्तनत के पराभव की पहली शुरूआत हैदराबाद से ही हुई थी। ये वही काल था जब छत्रपति शिवाजी महाराज का उद्वभ हो रहा था।

तब से हैदराबाद दक्षिण का लालकिला बना हुआ है। जिसे मराठे और ब्रिटिश भी शिकस्त नहीं दे पाए थे। उसे सरदार पटेल ने ताकत के बूते भारत में मिला दिया था। उस वक्त एआईएमआईएम भी मरणासन्न हो गई ​थी। कालांतर में एआईएमआईएम फिर से मजबूत होकर इलाके की बड़ी राजनीतिक ताकत बन गई। दक्षिण में मुस्लिम वर्चस्व की एकमात्र राजधानी हैदराबाद ऐतिहासिक रूप से हिंदूवाद की दुखती रग है। उसे ढहाने के सपने को पूरा करने के लिए वह सर्वश्रेष्ठ चुनावी योद्धाओं के साथ रण में उतरा है।

माना जा रहा है कि उसकी योजना एआईएमआईएम से निपटकर हैदराबाद को भगवा में रंगने की है। इससे लम्बे समय तक निजाम के पंजे में रहे शहर को जीत लेने का अहसास किया जा सकेगा। इसे अति​श्योक्ति कहा जा सकता है लेकिन इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि उस अहसास के लिए वे कुछ भी कर गुजरने को तैयार हैं। इससे हिंदुत्व की विजय के साथ ही दक्षिण भारत के सबसे महत्वपूर्ण शहर की चाबी भी उसके हाथ आ जाएगी। नहीं भूलना चाहिए कि हैदराबाद नगर निगम क्षेत्र में तेलंगाना विधानसभा की 24 सीट हैं। इसके अलावा पूरे शहरी क्षेत्र में चार लोकसभा सीट भी हैं।

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