नई दिल्ली. दिल्ली को एक माह से अधिक समय से घेरे बैठे किसान सरकार से बातचीत के दौरान अपना खाना क्यों खाते हैं और यह रणनीति उन्होंने किससे उधार ली है! इस सवाल का जवाब महात्मा गांधी हैं। गांधी 1945 के बाद जब भी सरकार के प्रतिनिधियों से बातचीत करने जाते थे तो अपने आश्रम में बकरी के दूध से बने दही और सादा भोजन साथ लेकर जाते थे। इससे अंग्रेज वायसराय लार्ड माउंटबेटन बहुत चिढ़ता लेकिन गांधी पर इसका कोई असर नहीं होता उल्टे वे कभी-कभी माउंटबेटन को बकरी के दूध का दही आफर करके खीजने के लिए मजबूर भी कर देते थे।

यहां बता दें कि आंदोलनकारी किसानों के इस पैंतरे से भाजपा और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ही नहीं पूरी दुनिया हतप्रभ है कि वे बातचीत के बाद होने लंच ब्रेक में अपना लाया हुआ भोजन करते हैं। हालांकि छठे दौर की वार्ता में सरकार के मंत्रियों ने किसानों का लाया भोजन खाकर कृषि कानूनों पर लचीला रवैया अपनाने का संकेत दिया है। इससे पहले की बातचीत के दौरान मंत्री सरकार का खाना खाते रहे हैं और अपने लंगरों से आया भोजन जमीन पर बैठकर खा रहे किसानों की तस्वीर सामने आती रही है।

कृषि कानूनों पर किसान संगठनों और केंद्र के बीच विज्ञान भवन में बुधवार को हुई बातचीत में किसान कानून वापसी पर ही अड़े रहे। बातचीत के बीच लंच ब्रेक में किसानों ने आज भी अपनी ही दाल-रोटी खाई। कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने भी उनकी दाल—रोटी चखी।

बातचीत से पहले भारतीय किसान यूनियन प्रवक्ता राकेश टिकैत ने कहा कि नए कृषि कानून बनने के बाद उत्तर प्रदेश में फसलों की कीमतें गिर गईं। इनकी खरीद समर्थन मूल्य से नीचे हो रही है। धान का भाव 800 रुपए प्रति क्विंटल मिल रहा है। किसान मजदूर संघर्ष समिति पंजाब के संयुक्त सचिव सुखविंदर सिंह सबरा ने कहा कि सरकार को तीनों कृषि कानून वापस लेने चाहिए।

राकेश टिकैत ने कहा कि देश में विपक्ष की मजबूती सरकार को काबू में रखती है। कृषि कानूनों के खिलाफ विपक्ष को सड़कों पर प्रदर्शन करना चाहिए। किसानों और सरकार के बीच पिछली बातचीत 8 दिसंबर को हुई थी।

किसानों के साथ पहली बातचीत 14 अक्टूबर को हुई जिसमें कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर नहीं बल्कि कृषि सचिव आए। किसानों ने बैठक का बॉयकाट कर दिया। दूसरी बातचीत 13 नवंबर को कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और रेल मंत्री पीयूष गोयल ने की। 7 घंटे की बातचीत बेनतीजा रही। सरकार के साथ 1 दिसंबर को तीसरे दौर की वार्ता में तीन घंटे के बाद सरकार ने एक्सपर्ट कमेटी बनाने का सुझाव दिया, लेकिन किसान तीनों कानून रद्द करने की मांग पर ही अड़े रहे।

आंदोलनकारी किसानों से चौथे दौर की बात 3 दिसंबर को साढ़े 7 घंटे तक हुई। सरकार ने वादा किया कि एमएसपी से छेड़छाड़ नहीं होगी, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। पांचवें दौर की बात 5 दिसंबर को हुई जिसमें सरकार पर लिखित गारंटी देने को तैयार, लेकिन किसानों ने सरकार से हां या ना में जवाब मांगा कि वह कानून रद्द करेगी अथवा नहीं। किसानों के साथ छठे दौर की बातचीत 8 दिसंबर को होने वाली थी लेकिन वह रद्द कर दी गई।

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