नहीं खटखटाया जा सकेगा अदालत का दरवाजा

नई दिल्ली. केन्द्र सरकार ने राज्यों के अधिकारों को दरकिनार कर जिन तीन नए कृषि कानूनों को संसद से पारित कराया है, उनमें संविधान में वर्णित उन मूल अधिकारों को लगभग समाप्त कर दिया गया है जिनके चलते अन्याय होने पर भारत का कोई भी नागरिक अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है।

कृषक उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन एवं सरलीकरण) अधिनियम, 2020 की धारा 13 कहती है कि केंद्र या राज्य सरकार अथवा इनके किसी अधिकारी या किसी अन्य व्यक्ति को इस अधिनियम के तहत नेक नीयत या सद्भाव के साथ किए गए या किए जाने वाले किसी कार्य के लिए किसी वाद, मुकदमे या कानूनी कार्यवाही का सामना नहीं करना पड़ेगा। उन्हें न्यायिक जवाबदेही से पूरी तरह मुक्त रखा गया है। उन्हें ऐसे किसी कार्य के लिए, जिसे अच्छी भावना से किया गया हो, कानून के कठघरे में खड़ा नहीं किया जा सकता है। अर्थात कोर्ट का दरवाजा खटखटाने का रास्ता बंद कर दिया गया है।

अदालतें नहीं सुन सकेंगी जनहित याचिका

इसी कानून की धारा 15 में कहा गया है कि किसी भी दीवानी अदालत के पास किसी भी ऐसे केस की सुनवाई करने का कोई अधिकार नहीं होगा, जिसका संज्ञान इस अधिनियम या इसके नियमों के तहत अधिकारप्राप्त किसी प्राधिकारी द्वारा लिया गया हो। इस धारा के तहत केस दायर करने के अधिकार से सिर्फ किसानों को ही वंचित नहीं किया गया है बल्कि कोई दूसरा भी ऐसा नहीं कर सकेगा यानी अन्य कोई भी इन कानूनों के तहत हुए अन्याय के खिलाफ अदालतों में जनहित याचिका भी दायर नहीं कर सकेगा। कानूनी सहायता हासिल करने के अधिकार से नागरिकों को वंचित करने की इन धाराओं को कृषि कानूनों में क्यों शामिल किया गया है, इसका सरकार ने अभी तक खुलासा नहीं किया है।

जज, जूरी और जल्लाद में बदल जाएंगे अधिकारी

दूसरे शब्दों में कहें तो इन कानूनों की भाषा छोटे से छोटे अधिकारी को न्यायपालिका के अधिकारों से लैस करने वाली है। इन कानूनों के सुरक्षा कवच से सरकारी अधिकारी जज, जूरी और जल्लाद में बदल जाएंगे। इन कानूनों में छुपे खतरों से चिंतित दिल्ली बार काउंसिल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक चिट्ठी लिखकर पूछ चुकी है कि सिविल मामलों से जुड़े किसी कानूनी विवाद का फैसला ऐसी संरचनाओं के सुपुर्द कैसे किया जा सकता है, जिसमें कार्यपालिका के प्राधिकारियों से नियंत्रित प्रशासनिक एजेंसियां शामिल हैं? कार्यपालिका को न्यायिक शक्तियां सौंपने की इस कार्यवाही को दिल्ली बार काउंसिल ने ‘खतरनाक और बड़ी गलती’ बताया है। उसने पत्र में लिखा है कि यह खासतौर पर जिला न्यायालयों को भारी नुकसान पहुंचाएगा और वकीलों की जड़ खोदेगा।

संविधान की धारा 32 भी हो जाएगी निष्प्रभावी

इसी तरह मूल्य आश्वासन और कृषि सेवा पर कृषक (सशक्तिकरण और संरक्षण) समझौता अधिनियम, 2020 की धारा 19 में कहा गया है कि ‘ऐसे किसी विवाद, जिस पर फैसला लेने का अधिकार सब डिविजनल प्राधिकारी या अपीलीय प्राधिकारी को दिया गया है, के खिलाफ वाद सुनने का अधिकार किसी भी दीवानी अदालत के अधिकारक्षेत्र में नहीं होगा। कोई भी कोर्ट या प्राधिकरण इन पर रोक नहीं लगा पाएगा। अधिनियम की धारा 19 संविधान की धारा 32 को भी निरस्त कर देगी। इसी धारा के तहत जनता को संवैधानिक उपचार का अधिकार मिलता है।

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