नई दिल्ली. तीन नए कृषि कानूनों को निश्चित समयावधि के लिए स्थगित करने का मोदी सरकार का प्रस्ताव उन चुनावी मजबूरियों के चलते आया है जिनमें जीत हासिल करना मोदी सरकार के लिए बेहद अहम है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस प्रस्ताव के जरिए मोदी सरकार 2021 में होने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में राजनीतिक नुकसान का डेमेज कंट्रोल करना चाहती है।

हालांकि कुछ जानकार सरकार के प्रस्ताव को आरएसएस के हस्तक्षेप का नतीजा बता रहे हैं लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को ठुकरा दिए जाने के बाद सरकार को ये अहसास हो गया कि किसानों को हटाने के लिए उसे कृषि कानून लागू करने की जिद छोड़नी होगी अन्यथा उससे होने वाले नुकसान की भरपाई कर पाना उसके लिए बेहद मुश्किल हो जाएगा।

दिल्ली सीमा पर नए कृषि क़ानून के विरोध में किसान पिछले दो महीने से प्रदर्शन कर रहे हैं। सरकार और किसान संगठनों के बीच 10 दौर की बातचीत हो चुकी है। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हो चुकी है। कमेटी का गठन भी हो गया है, लेकिन अब तक कोई हल नहीं निकला।

आरएसएस से जुड़ी संस्था स्वदेशी जागरण मंच के राष्ट्रीय सह संयोजक अश्विनी महाजन का कहना है कि नए कृषि क़ानून किसानों के हित में हैं, लेकिन फसल का न्यूनतम मूल्य तय होना भी जरूरी है। सरकार का कानून स्थगित करने का प्रस्ताव बताता है कि क़ानूनों को लेकर सरकार का मन खुला है। ये निर्णय स्वागत योग्य है। ये बात सही है कि ये पहला मौक़ा नहीं है, जब किसी क़ानून पर केंद्र सरकार ने अपना स्टैंड बदला हो।

इससे पहले कृषि से जुड़े भूमि अधिग्रहण क़ानून पर भी केंद्र सरकार पीछे हटी थी। तब संसद में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भूमि अधिग्रहण क़ानून का विरोध करते हुए केंद्र सरकार को ‘सूट-बूट की सरकार’ कहा था। इसके अलावा चाहे एनआरसी की बात हो या फिर नए श्रम क़ानून की, इन पर भी सरकार उतनी आक्रामक अभी नहीं दिख रही है।

पूर्व बीजेपी नेता सुधींद्र कुलकर्णी ने ट्वीट करके कहा कि सरकार अपनी बात से पीछे हट गई है। ये प्रस्ताव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वाभाव के बिल्कुल विपरीत है। नरेंद्र मोदी के बारे में कहा जाता है कि एक बार जो वो क़दम लेते हैं तो पीछे नहीं हटते। लेकिन ये प्रस्ताव, उनकी इस छवि के उलट है। ये प्रस्ताव दवाब में लिया गया फ़ैसला है। सरकार के पास दूसरा कोई चारा नहीं था। दो महीने से किसान सड़कों पर बैठे थे। हिंसा नहीं हुई और माहौल शांति पूर्ण रहा। सुप्रीम कोर्ट की कमेटी से भी कोई फर्क़ नहीं पड़ा। आख़िर में ट्रैक्टर रैली के आयोजन की बात हो रही है, इससे सरकार को बात समझ में आ गई कि किसान झुकने वाले नहीं हैं।

आरएसएस में नंबर दो भैय्याजी जोशी ने एक अंग्रेजी अखबार को दिए इंटरव्यू में कहा कि दोनों पक्षों को इस समस्या के हल के बारे में सोचना चाहिए। लंबे आंदोलन लाभकारी नहीं होते हैं। आंदोलन से किसी को समस्या नहीं होनी चाहिए। लेकिन बीच का रास्ता ज़रूर निकाला जाना चाहिए।

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