किसान आंदोलन के पीछे ये है असली कारण

नई दिल्ली. पिछले तीन सप्ताह से दिल्ली को घेरकर बैठे किसानों के मन में आशंका है कि तीन नए कृषि कानूनों के जरिए उन्हें विविध फसलें उगाने के लिए बाध्य किया जा सकता है और यह बाध्यता उन्हें कर्ज के गम्भीर जाल में फंसा सकती है क्योंकि 2014 में केन्द्र की ओर से जारी राज्यों की फसल विविधता रिपोर्ट इसकी बानगी के रूप में सामने है! राज्यों की फसल विविधता रिपोर्ट में टॉप पर रहने वाले कर्नाटक, दूसरे स्थान पर रहे महाराष्ट्र और तीसरे स्थान पर आए गुजरात के किसानों की माली हालत किसी से छुपी हुई नहीं है।

2014 में जारी हुई राज्यों की फसल विविधता रिपोर्ट में कर्नाटक फसल विविधता में भारत में सबसे आगे बताया गया और दूसरे और तीसरे स्थान पर महाराष्ट्र और गुजरात थे। इसके बावजूद तीनों राज्यों के किसान पंजाब और हरियाणा के किसानों जितने सम्पन्न नहीं हैं क्योंकि विविध फसल उगाने वाले किसानों को सरकार उस तरह का बाजार मुहैया कराने में नाकाम रही है जिसमें जाकर किसान अपनी लागत और उस पर मुनाफा कमा सकें। दिल्ली को घेरकर बैठे किसानों के मन में नए कृषि कानूनों के जरिए विविध फसलें उगाने पर मजबूर किए जाने का अंदेशा हैं और इसी के चलते वे इन कानूनों का विरोध कर रहे हैं क्योंकि विविध फसलों के दाम गेहूं और धान के बराबर किसी भी कीमत पर नहीं मिल सकते।

दिल्ली बार्डर पर प्रदर्शन में वे किसान भी शामिल हैं जो एमएसपी के सुरक्षा कवच वाली धान और गेहूं के अलावा दूसरी फसल उगाकर भारी कर्ज में डूब गए। दिल्ली के बार्डर पर पिछले तीन सप्ताह से जमे एक किसान का कहना है कि धान और गेहूं के अलावा, दूसरी फसल उगाने के लिए काफ़ी प्रयास किया। एक बार सूरजमुखी लगाया। तब उसकी फसल 1000 रुपये क्विंटल में बिकी थी। जब सरसों की खेती की तो एक क्विंटल सरसों की कीमत 2000 रुपये मिली।

एक अन्य किसान का कहना है कि वे गेहूं, धान के अलावा दूसरी फसल उगाने को तैयार है, जब फसल के भाव सही नहीं मिलते हैं तो वे फिर से गेहूं और धान उगाने लगते हैं। एक अन्य किसान ने गाजर उगाया लेकिन मंडी में उसकी कीमत 5 से 7 रुपए किलो मिली। किसानों का कहना है कि कोई दूसरी फसल उगाओ तो उसके पैसे मिलने में महीनों लग जाते हैं। गेहूं और सरसों तो आढतिए सीधे ख़रीद कर पैसे तुरंत दे देता है।

यहां यह उल्लेखनीय है कि 2015-16 में हुई कृषि गणना के अनुसार भारत के 86 फ़ीसदी किसानों के पास 2 हेक्टेयर से कम ज़मीन है। पंजाब में 1970-71 में धान की खेती 3.9 लाख हेक्टेयर में होती थी वो 2018-19 में 31 लाख हेक्टेयर में होने लगी. यानी पाँच दशक में आठ गुणा बढ़ोतरी। उसी तरह से पंजाब में 1970-71 में 22.99 लाख हेक्टेयर में गेहूं की खेती होती थी। 2018-19 में ये बढ़ कर 35.20 लाख हेक्टेयर में होने लगी। यानी पाँच दशक में डेढ़ गुणा बढ़ोतरी।

ये आँकड़े यह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि पंजाब में गेहूं और धान की खेती सबसे ज़्यादा क्यों होती है?  हरियाणा के कुछ इलाकों में पानी की समस्या है। धान की खेती में ज़्यादा पानी लगता है, इसलिए पंजाब के मुकाबले हरियाणा में धान की खेती कम होती है। हरियाणा में गन्ने की खेती भी होती है।

धान की वजह से पंजाब में भूजल स्तर काफ़ी नीचे चला गया है। 1970-71 में पंजाब में ट्यूबवैल की संख्या 2 लाख थी जो 2018-19 में बढ़ कर 14 लाख हो गई है। पंजाब के 12 ज़िलो में पिछले तीन दशक में जलस्तर 6.6 मीटर से 20 मीटर तक नीचे चला गया है। पंजाब का जल स्तर अगर धान की खेती की वजह से नीचे जा रहा है तो मतलब ये कि पंजाब से केंद्र सरकार धान नहीं भूजल ख़रीद रही है। जितना धान केंद्र सरकार पंजाब से ख़रीदती है उसे उगाने में तकरीबन 63 हज़ार बिलियन लीटर पानी की आवश्यकता पड़ती है, जिसमें से 70 फीसदी ग्राउंड वॉटर है।

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