घनघोर गरीबी के कुचक्र में फंसे हुए हैं कुम्हार

नई दिल्ली. चहुं ओर दीवाली के माहौल में उन कुम्हारों के घर अंधेरा छाया हुआ है जो दीपमाला सजाने के लिए मिट्टी के दीपक बनाते हैं।
आधुनिकता के दौर में कुल्हड़ के बजाय प्लास्टिक के गिलास, मिट्टी के कलश की जगह स्टील और पीतल के कलश के चलन ने कुम्हारों के पुश्तैनी धंधे पर संकट पैदा कर दिया हैं।
हिन्दुओं में कुम्हार और मुस्लिमों में कसघड बिरादरी मिट्टी को गूंथ कर चाक के सहारे दीपक, खिलौने, बर्तन घूमते चाक पर हाथों की कारीगरी से बनाते हैं। मिट्टी के दिए जलाकर दीपावली में भले ही लोग अपने घरों को जगमगाते हैं,लेकिन कुम्हार आज भी झुग्गी झोपड़ियों में जीवन बसर करने को मजबूर हैं।

इसलिए घटा मिट्टी के बर्तनों का प्रचलन

अब इस धंधे में कुछ बचा नहीं है, इस कारण लोगों ने मजबूरी में काम छोड़ दिया है। धंधे में पहले परिवार का भरण पोषण कर लेना आसान था लेकिन आधुनिकता के दौर में चाक के सहारे तैयार मिट्टी के बर्तन का प्रचलन काफी घट चुका है। महंगाई के अनुपात में आमदनी कम हो गई है।
चाइनीज़ सामानों के चलन से धंधा फीका है। बनाने से भट्टियों में पकाने और रखने उठाने में कई बर्तन टूट जाते हैं। लकड़ी व कोयले के आसमान छूते भावों के चलते बर्तन पकाने में मोटी रकम खर्च करनी पड़ती है। माना जाता है कि दीपावली पर मिट्टी के दिये जलाए जाने से हानिकारक कीट पतंगे जल जाते है। तेल जलने से वातावरण भी शुद्ध रहता है।

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