मंडियों में औंधे मुंह पड़े हैं बासमती चावल के भाव

नई दिल्ली. विज्ञापनों में जिस बासमती को खाने का आग्रह सदी के महानायक अमिताभ बच्चन जिस नाटकीय अंदाज में करते हैं, उससे बासमती उगाने वाले किसानों के सीने में तूफान सा घुमड़ने लगता है। उनकी इच्छा होती है कि विज्ञापन बनाने वाले और उसमें अभिनय करने वाले को पकड़कर उससे पूछें कि बाजार जिस बासमती को 200 रुपए किलो तक बेच रहा है, किसानों को उसका चौथाई भाव भी क्यों नहीं मिलता है!
जी हां ये एक सच्चाई है, बेहतरीन खुशबू से खाने वाले का मन मोह लेने वाले बासमती के भाव इन दिनों मंडियों में औंधे मुंह पड़े हुए हैं। दिल्ली की मंडियों में बासमती 2,300-2,400 रुपए, पंजाब में 1,800-2,000 और उत्तर प्रदेश में 1,500-1,600 रुपए के भाव पर बिक रहा है। करीब 40 हजार प्रति एकड खर्च वाली खेती से उपजे बासमती चावल के भाव लगातार कम हो रहे हैं। 2014 में बासमती का अधिकतम भाव 4,500 रुपए प्रति क्विंटल था। उसके बाद से बासमती चावल के भाव लगातार लुढ़क रहे हैं। फसल के वक्त मंडी में आवक बढ़ते ही भावों में फिसलने की होड़ लग जाती है। किसान अब बासमती की खेती को घाटे का सौदा मानते हैं।
बासमती की खेती में हर साल हो रहे घाटे को देखते हुए किसान इसे उगाने से मुंह मोड रहे हैं। किसान बासमती से मोहभंग होने की वजह बताते हुए कहते हैं कि जो भाव मिलते हैं, उनसे लागत भी नहीं निकलती। 2015 से बासमती के भाव लगातार गिर रहे हैं। इस साल भाव अब तक के न्यूनतम स्तर पर पहुंच गए हैं। अभी बासमती-1509 का बाजार भाव 1,700 रुपए प्रति क्विंटल है। ये भाव एमएसपी पर बिकने वाले साधारण चावल से भी कम है। इतने कम भाव पर भी खरीद नहीं हो पा रही है। व्यापारी कभी नमी तो कभी खराब गुणवत्ता का बहाना बनाकर उपज खरीद से इनकार कर रहे हैं।
घाटे का सौदा साबित हो रही बासमती की खेती कम उपज, बढ़ती लागत के चलते किसानों के गले का फंदा साबित हो रही है। बासमती उगाने वाले राज्यों और किसानों का ये हाल तब है जब दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश समेत 7 राज्यों के बासमती को जीआई (जियोग्राफिकल इंडिकेशन) टैग हासिल है। यह टैग केवल उन्हीं उत्पादों को हासिल होता है जो किसी विशेष क्षेत्र में विशेष खूबियों वाले होते हैं।

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