नई दिल्ली. फूलों के खेतों में काम करने वाले बच्चे जहरीले कीटनाशकों की चपेट में आकर बीमार हो रहे हैं। ये दावा 3 दिसंबर को टॉक्सिक ब्लूम्स: इम्पैक्ट्स ऑफ पेस्टिसाइड्स इन इम्पेक्ट्स ऑफ फ्लोरीकल्चर इंडस्ट्री इन तमिलनाडु रिपोर्ट में किया गया है।

तमिलनाडु के तिरुवल्लूर जिले में बड़े पैमाने पर चमेली की खेती की जाती है। जिसमें प्रतिबंधित जहरीले रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है। चमेली के खेतों में ज्यादातर दलित बच्चे मजदूरी करते हैं और प्रत्येक सप्ताह में एक दिन बीमार रहते हैं। 9 वर्ष से 13 वर्ष की उम्र तक के बच्चों में सिरदर्द, त्वचा संबंधी परेशानियां, उल्टी, थकान, नींद की कमी, झटके, सुस्ती, बुखार और शरीर दर्द जैसी समस्याओं से जूझना पड़ता है।

पेस्टीसाइड एक्शन नेटवर्क एशिया पैसिफिक, सोसाइटी फॉर रूरल एजुकेशन एंड डेवलपमेंट और पैन इंडिया के संयुक्त अध्ययन में बताया गया है कि तमिलनाडु में फ्लोरिकल्चर फार्मों में खतरनाक कीटनाशकों का इस्तेमाल होता है। अमेरिका, नीदरलैंड, यूनाइटेड किंगडम, जर्मनी और यूनाइटेड अरब अमीरात भारतीय फूलों के सबसे बड़े आयातक हैं।

अध्ययन में कुल 109 कीटनाशकों में से 82 फीसदी अत्यधिक खतरनाक कीटनाशकों की पहचान की गई है। 44 अत्यधिक खतरनाक कीटनाशकों में से 32 ऐसे कीटनाशक पाए गए जो एक या उससे अधिक देशों में प्रतिबंधित हैं और ज्यादातर मधुमक्खियों के लिए घातक हैं। इनमें साइपरमेथ्रिन, लैम्बडासैलोथ्रिन, क्लोरपाइरीफोस, मोनोक्रोटोफोस, पैराक्वाट, ग्लाइफोसेट, डाइक्लोरोस, मैन्कोजेब और पर्मेथ्रिन शामिल हैं।

पैराक्वाट और क्लोरपाइरीफोस ऐसे कीटनाशक हैं जिन्हें फूलों की खेती में प्रतिबंधित किया हुआ है लेकिन उनका इस्तेमाल उन खेतों में किया जाता है, जहां बच्चे काम करते हैं। अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक फूलों की खेती में किए जा रहे खतरनाक कीटनाशकों का इस्तेमाल राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मानकों का खुला उल्लंघन है।

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