नई दिल्ली. समुद्री शैवाल का भारतीय आयुर्वेद में हज़ारों साल से इस्तेमाल हो रहा है, लेकिन भारतीय संस्कृति इसे उस तरह अंगीकार नहीं कर पाई जिस तरह एशिया के अन्य देशों ने उसे स्वीकार किया है। तमिलनाडु के रामेश्वरमृ के आसपास पम्बन द्वीप और मन्नार की खाड़ी से पारंपरिक उपचार के लिए सदियों से समुद्री शैवाल निकाले जाते रहे हैं। अब केन्द्र सरकार ने इसकी सुध ली है और वह इस इलाके को समुद्री शैवाल की खेती के लिए मॉडल के तौर पर विकसित कर रहा है। समुद्री शैवाल की खेती वैश्विक स्तर पर सालाना 8 फ़ीसद की दर से बढ़ रही है।

उष्णकटिबंधीय मौसम, उथले पानी और पोषक तत्वों की भरमार के कारण देश के गुजरात और तमिलनाडु के सागर क्षेत्र में क़रीब 282 तरह की शैवाल की प्रजातियां मिलती हैं। देश के सागर तटों के आसपास उथले समुद्र में कुल 841 प्रजातियों के शैवाल मिलते हैं। शैवाल आयोडीन, विटामिन और प्रोटीन के अच्छे स्रोत हैं। ये कुपोषण दूर करते हैं। इसी के चलते केन्द्र सरकार ने अगले पाँच साल में समुद्री शैवाल की खेती को बढ़ावा देने के लिए 8.7 करोड़ डॉलर की सब्सिडी देने का ऐलान किया है।

समुद्री शैवाल कार्बन डाई-ऑक्साइड अवशोषित करते हैं, कार्बन को शर्करा में तब्दील करते हैं और पानी में ऑक्सीजन मुक्त करते हैं। मृत होने पर ये शैवाल समुद्र की तलहटी तक चले जाते हैं और उनमें मौजूद कार्बन तलछट में क़ैद रहता है। कार्बन इकट्ठा करने के अलावा, सी-वीड समुद्री भोजन की श्रृंखला बनाते हैं।

बड़े पैमाने पर शैवाल की खेती साल 2000 में शुरू हुई जब सरकार ने पेप्सिको को इसका लाइसेंस दिया। इससे भारत में समुद्री शैवाल की वाणिज्यिक खेती को बढ़ावा मिला। वैसे पम्बन द्वीप और जैव विविधता से समृद्ध मन्नार की खाड़ी में पारंपरिक उपचार के लिए सदियों से समुद्री शैवाल निकाले जाते हैं। स्थानीय लोग ऐतिहासिक रूप से स्वदेशी प्राकृतिक समुद्री वनस्पतियां एकत्र करते रहे हैं।

भारत अब इन्हीं गांवों को समुद्री शैवाल की खेती के लिए मॉडल के तौर पर विकसित कर रहा है, जो वैश्विक स्तर पर सालाना 8 फ़ीसद की दर से बढ़ रहा है। वैसे भारतीय शोधकर्ता लंबे समय से टिकाऊ खेती के तौर पर समुद्री शैवाल की खेती अपनाने की वकालत करते रहे हैं. उष्णकटिबंधीय मौसम, उथले पानी और पोषक तत्वों की भरमार के कारण भारत के लंबे सागर तट इसके लिए आदर्श है।

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