बिहार को मिला नया नेता

नई दिल्ली. भले ही तेजस्वी यादव सरकार नहीं बना सके। लेकिन राष्ट्रीय जनता दल को बिहार में नई ​ताकत मिल गई है क्योंकि उन्होंने राज्य की सत्ता पर डेढ़ दशक से काबिज जेडीयू और बीजेपी से मुकाबला करके आरजेडी को विधानसभा में सबसे बड़े दल के रूप में जगह जो दिलाई है।

ऐसे की प्रधानमंत्री के हमलों से खुद की सुरक्षा

तेजस्वी ने पिता लालू यादव के जेल में होने और उनके शासन को जंगलराज करार दिए जाने के आरोपों के बीच जिस खास रणनीति से चुनाव लड़ा उसकी चहुं ओर चर्चा है। बेरोज़गारी, शिक्षा/चिकित्सा-व्यवस्था की बदहाली, श्रमिक-पलायन और बढ़ते भ्रष्टाचार के सवाल उठाकर उन्होंने युवा वोटर को आकर्षित करने में जो कामयाबी हासिल की, राहुल गांधी राष्ट्रीय स्तर पर उसे पाने की पिछले सात साल से कोशिश कर रहे हैं, लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के धारदार हमलों से वे वैसी वेव नहीं बना पाते जैसी तेजस्वी ने उन्हीं मोदी के लगातार किए जा रहे तंज के बावजूद बना दी।

पुराने लालू-राबड़ी राज को जंगलराज और तेजस्वी को उसका युवराज बताने को केन्द्र में रखकर हो रहे हमलों को तेजस्वी ने अनदेखा कर दिया और अपनी लाइन पर सभाओं में सत्ताधारी गठबंधन पर हमला करते रहे। तेजस्वी का 10 लाख सरकारी नौकरी का वादा युवाओं को पूरी तरह उनके पाले में नहीं ला सका लेकिन वादा उनमें आकर्षण का भाव जरूर पैदा कर गया।

महागठबंधन को लगभग सत्ता के नजदीक पहुंचाकर तेजस्वी ने देश भर के विश्लेषकों का ध्यान खींचा है। हालांकि जीतनराम माँझी, उपेंद्र कुशवाहा और मुकेश सहनी से जुड़ी पार्टियों को ‘महागठबंधन’ से जोड़े रखने में आई दिक्कत के चलते मुस्लिम मतों में विभाजन और सवर्ण मतों की उम्मीद घट जाने की आशंका के चलते उनसे कांग्रेस को सत्तर सीट देने की मजबूरी ने उनका गणित बिगाड दिया।

Leave a comment

Your email address will not be published.