नई दिल्ली. मंगलवार को दोपहर तक एक दूसरे की वैक्सीन की क्षमता पर सवाल खड़े कर रही भारत की उन दोनों कम्पनियों ने समझौता कर लिया है जिन्होंने भारत में कोवैक्सीन और कोविशील्ड वैक्सीन बनाए हैं। भारत बायोटेक और सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया के एक साझा बयान में कहा गया है कि गलतफहमी दूर होने के बाद दोनों कम्पनियां एक ही पलेटफार्म खड़ी हैं।

फार्मा क्षेत्र के जानकार इसका अर्थ लगा रहे हैं कि आगे से दोनों कम्पनियां सार्वजनिक रूप से एक—दूसरे के टीके की आलोचना नहीं करेंगी। बयान में शाब्दिक मायाजाल का प्रयोग करते हुए सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया के सीइओ अदार पूनावाला ने ट्वीट किया, ‘इस बयान से ग़लतफ़हमी दूर हो जानी चाहिए।’ भारत बायोटेक ट्विटर अकाउंट पर लिखा गया, ‘हमारा प्रण भारत और विश्व में सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया के साथ सहज ढंग से वैक्सीन पहुँचाना है’ सवाल है कि एक-दूसरे की वैक्सीन को लगभग निष्प्रभावी बता रहीं दोनों कम्पनियां एकाएक गल​बहियां क्यों करने लगी?

ये है समझौते के पीछे का सच

जानकारों का कहना है कि दोनों कम्पनियों के बीच विवाद मामले में राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत यह कहते हुए कूद पड़े कि सीरम इंस्टीट्यूट और भारत बायोटेक कंपनियों की वैक्सीन को मंज़ूरी मिलने के बाद दोनों कंपनियों के बीच आपसी बयानबाज़ी दुर्भाग्यपूर्ण है। यह संवेदनशील मुद्दा है जिसमें प्रधानमंत्री को दख़ल देना चाहिए। माना जा रहा है कि गहलोत के ट्वीट के साथ ही विवाद को हल्के में ले रहा सरकार का शीर्ष नेतृत्व चौकन्ना हो गया।

जानकारों का मानना है कि गहलोत के बयान के बाद भी विवाद जारी रहने से बात सीधे प्रधानमंत्री को टारगेट करती, इसलिए ‘कोवैक्सीन’ को पानी बताने और जवाबी हमले में ‘कोविशील्ड’ के साइड इफेक्ट दबाने के लिए पैरासिटामोल के ​इस्तेमाल का दावा करने वाली दोनों कम्पनियों को समझौते की टेबल पर आना पड़ा।

भाजपा की राजनीति पर गहराई से नजर रखने वालों का कहना है कि अखिलेश यादव के ‘भाजपा की वैक्सीन’ बयान और कांग्रेस की एक टोली के वैक्सीन मंजूरी प्रक्रिया पर सवाल उठाने से भाजपा को जो राजनीतिक फायदा हो रहा था, वह अशोक गहलोत के इस बयान के साथ ही नकारात्मक हो गया जिसमें उन्होंने दोनों कम्पनियों के बीच बयान युद्ध को दुर्भाग्यपूर्ण बताकर प्रधानमंत्री से हस्तक्षेप की मांग कर डाली।

इससे कांग्रेस नेताओं की टोली की ओर से परीक्षण प्रक्रिया पर उठाए जा रहे सवालों को भी ताकत मिल रही थी। उधर चिकित्सा और टीका विशेषज्ञ भी सरकार से लगातार सवाल कर रहे थे। इसलिए विवाद और जारी रहने पर उत्पन्न होने वाले राजनीतिक दुष्प्रभाव से वाकिफ सरकार ने दोनों कम्पनियों को हमले रोकने और साझा बयान देने पर मजबूर कर दिया।

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