नई दिल्ली. चम्बल के डाकुओं से हर कोई डरता है, लेकिन कुछ परिंदे ऐसे हैं जिन्हें बंदूकों की गोलियों से भी भय नहीं लगता। चम्बल की मीलों फैली जलराशि पर फडफडाते पंख इसका प्रमाण हैं। चम्बल आए परिंदों में गीज, पिनटेल, शालवर, स्पाटबिल, ब्रहमनीडक, स्पूनबिल, मर्गेजर, वेडर, गार्गेनी, पेनीकल, पाइड, एवोसिट, रिवर टर्न, सीगल, प्रेटीन कोल शामिल हैं।

कई लाख प्रवासी डालते हैं डेरा

अनुमान है कि सर्दी शुरू होते ही कम से कम एक लाख पंछियों ने चम्बल पर डेरा डाला है। चंबल सेंचुरी में नवंबर से ही पक्षियों के आने की शुरुआत एक अच्छा संकेत है। सेंचुरी में अफगानिस्तान, पाकिस्तान, श्रीलंका तथा म्यांमार से विदेशी पक्षी आ रहे हैं। 425 किलोमीटर क्षेत्रफल में फैली सेंचुरी में हवासीर, राजहंस, समन जैसे विदेशी पक्षी मार्च तक यहीं डेरा जमाएंगे। चंबल सेंचुरी में कई लाख प्रवासी पक्षी सर्दी के मौसम में सालों दर साल से आ रहे हैं।

दुर्लभ जलचरों का घर है चम्बल

दुर्लभ जलचरों के घर अर्थात तीन राज्यों में फैली चंबल सेंचुरी में डाॅल्फिन, घड़ियाल, मगर और कई प्रजाति के कछुए रहते हैं। ये पक्षी ज्यादातर चीन, यूरोप और सेंट्रल एशिया से आते हैं। कामनटील, नार्दन शिवेलर, ग्रेट कारमोरेंट, पोचार्ड आदि पक्षी यहां पहुंच चुके हैं। चंबल सहसों सेतु, डिभौली सेतु, पचनदा, बाबा सिद्धनाथ मंदिर आदि घाटों पर प्रवासी मेहमानों भोजन खोजते आसानी से देखा जा सकता है।

देखे जा सकते हैं सुर्खाव के पर

चम्बल में भरेह तथा यमुना क्षेत्र में कसौआ इन प्रवासी पक्षियों के आने के प्रमुख स्थान हैं। यहां आने वाले पक्षियों में ब्रामनीडक को सबसे ज्यादा खूबसूरत माना जाता है। इसे भारत में सुर्खाव के नाम से जाना जाता है। इसके अलावा लार्ज कारमोरेन, स्माॅल कारमोरेन और डायटर (स्नेक वर्ड) भी चम्बल में जमकर शिकार कर रहे हैं।

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