वैज्ञानिकों ने पॉम कचरे से बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक बनाया

नई दिल्ली. प्लास्टिक से परेशान दुनिया अब राहत की सांस ले सकेगी क्योंकि वैज्ञानिकों ने ऐसा प्लास्टिक बनाने का रास्ता खोज लिया है, जो अनाज और सब्जियों के कचरे की तरह मिट्टी में मिल जाएगा।

वैज्ञानिकों ने पाया है कि पाम ऑयल के कचरे से ऐसा प्लास्टिक बनाया जा सकेगा जो इस्तेमाल करने के बाद अपने आप गल जाएगा। ये प्लास्टिक जैव आधारित बायोपॉलिमर कहलाएगा। पाम ऑयल उत्पादन के बाद बचे कचरे से बने बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक का उपयोग खाद्य पैकेजिंग के लिए किया जा सकता है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि हेमीसेलुलोज प्राकृतिक बायोपॉलिमर हैं, जो पॉलीसैकराइड्स और प्रोटीन जैसे पदार्थों से प्राप्त होता है। कम लागत वाले इस प्लास्टिक सम्बंधी शोध का प्रकाश करंट रिसर्च के ग्रीन एंड सस्टेनेबल केमिस्ट्री में हुआ है।

जानकारी के अनुसार अकेले मलेशिया में हर साल 1.98 करोड़ टन अपशिष्ट पाम फल बच जाते है। वैज्ञानिकों ने इसी अपशिष्ट को हेमिसेल्युलोज में बदल दिया। दुनिया भर में उत्पादित प्लास्टिक का लगभग एक-तिहाई (128.8 टन) पैकेजिंग में काम आता है। अनुमान है कि 10 करोड़ समुद्री जानवर हर साल समुद्र में फैंके गए प्लास्टिक के कारण मर जाते हैं। यही स्थिति जारी रही तो 2050 तक महासागरों में मछली कम प्लास्टिक अधिक होगा।

कृषि और बायोमास कचरे में हेमिसेल्युलोज प्रचुर मात्रा में होता है। ये बायोपॉलिमर लचीला है और पानी को रोक सकता है। इसका सबसे बड़ा गुण आसानी से नष्ट हो जाना है। इसका सस्ते और आसानी से नष्ट हो जाने वाली प्लास्टिक बनाने में उपयोग किया जा सकता है।

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