नई दिल्ली. वे अब सिर्फ एक सौ पचास की संख्या में बचे हैं और सुरक्षा नहीं मिली तो वे इतिहास के काले पन्नों में समा जाएंगे। इसके साथ ही थार के रेगिस्तान का एक ऐसा रक्षक समाप्त हो जाएगा जो चाव से उन टिड्डियों को खाता है, जो रेगिस्तान में मुश्किल से उगने वाली फसलों को चट करने के लिए कुख्यात है।

रेगिस्तान के इस रक्षक का नाम है ग्रेट इंडियन बस्टर्ड। इसका एक नाम गोडावण भी है। स्थानीय भाषा में इसे सोन चिरैया कहके भी दुलारा जाता है। शिकारियों के हाथों जैसे-तैसे जान बचाकर अपना अस्तित्व बरकरार रखने वाले गोडावण की जान अब रेगिस्तान के सौर ऊर्जा संयंत्र ले रहे हैं जिनके मीलों तक फैले तारों में उलझकर यह भारी पक्षी अपने प्राण त्यागने के लिए मजबूर है। हालांकि देश की सबसे बड़ी पर्यावरणीय अदालत नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने गोडावण की पुकार सुन ली है और उसने सरकार को आदेश दिया है कि रेगिस्तान में तब तक नए सौर ऊर्जा संयंत्र नहीं लगाए जाएं जब तक वे अपने तारों को जमीन के अंदर नहीं बिछाते।

ग्रेट इंडियन बस्टर्ड सिर्फ भारतीय उपमहाद्वीप में पाए जाते हैं। पिछले एक दशक में इसकी संख्या 250 से घट कर 150 ही रह गई है। ट्रिब्यूनल ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय को आदेश दिया कि वो सुनिश्चित करे कि जहां-जहां यह विलुप्तप्रायः पक्षी पाया जाता है, वहां सौर ऊर्जा के तारों पर बर्ड डाइवर्टर लगाए जाएं और नई सौर परियोजनाओं को तब तक अनुमति ना दी जाए जब तक उनके तारों को जमीन के नीचे बिछाने का कार्य पूरा नहीं हो जाता। हाल ही पर्यावरण मंत्रालय की एक रिपोर्ट में सामने आया था कि भारी करंट वाले बिजली के तार ग्रेट इंडियन बस्टर्ड पक्षियों की मृत्यु की घटनाओ में से 15 प्रतिशत के लिए जिम्मेदार हैं। असल में गोडावण इतने भारी होते हैं कि उड़ते समय सामने अड़चन आने पर अपनी दिशा नहीं बदल पाते और उससे टकरा जाते हैं। इसकी नजर भी कमजोर होती है।

बर्ड डाइवर्टर बिजली के तारों पर लगाए जाने वाले छोटे लेकिन चमकदार उपकरण होते हैं जो हवा के साथ घूमते रहते हैं। इनसे तार आसानी से दिख जाते हैं। दुनिया भर में इनके इस्तेमाल से पक्षियों की मृत्यु दर आधी हो गई है। ट्रिब्यूनल के आदेश महाराष्ट्र, राजस्थान, गुजरात, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश पर लागू होंगे।

राजस्थान का राज्यपक्षी गोडावण बड़े आकार के कारण शुतुरमुर्ग जैसा दिखता है। राजस्थान में इसे सोन चिड़िया, हुकना, गुरायिन आदि नाम से भी जाना जाता है। यह पक्षी भारत और पाकिस्तान के शुष्क एवं अर्ध-शुष्क घास के मैदानों में पाया जाता है। पहले यह पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, ओडिशा एवं तमिलनाडु के घास मैदानों में व्यापक रूप से पाया जाता था। गंभीर रूप से संकटग्रस्त श्रेणी में शामिल गोडावण भारतीय वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 की अनुसूची 1 का प्राणि है। गोडावण गेहूं, ज्वार, बाजरा खा लेता है लेकिन इसका प्रमुख भोजन टिड्डे हैं। मिल जाने पर सांप, छिपकली, बिच्छू भी खा लेता है।

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