नई दिल्ली. जल्दी ही जम्मू-कश्मीर के राज्य पक्षी ब्लैक नेक्ड क्रेन अर्थात काली गर्दन वाले सारसों को अपना ठिकाना बदलना होगा। अगर वे ऐसा नहीं करेंगे तो अथाह पानी में डूब जाएंगे। जी, हां हिमालय विशेषकर तिब्बत के पठार पर रहने वाले काली गर्दन के सारस, अरूणाचल में बनने वाला एक बांध के चलते उस स्थान को खो बैठेंगे जहां कम सर्दी में वे अंडे देते हैं और उस दौरान भोजन की तलाश में जुटे रहते हैं।

ब्लैक नेक्ड क्रेन का वैज्ञानिक नाम ग्रस नाइग्रीकोलिस है। ये सारस भारत में बहुतायत में है और मुख्य रूप से हिमालय की ऊंचाइयों पर रहते हैं। ब्लैक नेक्ड क्रेन तिब्बती क्रेन के रूप में लोकप्रिय है। भारत का हिमालयी क्षेत्र इस पक्षी के आवास हैं। ये सारस मुख्य रूप से तिब्बती पठार में रहता है। इसकी एक छोटी आबादी बगल के लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश और कश्मीर में भी पाई जाती है। कश्मीर के राज्य पक्षी काली गर्दन वाले सारस जम्मू-कश्मीर और त्सो कार झील के अलावा लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश के कुछ इलाकों में पाया जाता है।

दुनिया में सारस की महज 15 प्रजातियां ही बची हैं। संरक्षित प्रजाति के ये पक्षी भारत, चीन और भूटान में हिमालय के ऊंचे इलाकों में रहते हैं। जाड़ों में ये पक्षी कुछ नीचे उतर आते हैं. लेकिन एक अध्ययन कहता है कि अरुणाचल में एक प्रस्तावित बांध से इन ब्लैक-नेक क्रेन का घर नष्ट हो जाएगा। रिवर रिसर्च और एप्लीकेशन जर्नल में छपे अध्ययन का खर्च केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने उठाया है। वैसे भी अरूणाचल में बनने वाले बांधों पर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। नवंबर से फरवरी के बीच सारस अरुणाचल के जेमिथांग घाटी में पहुंचते हैं। लेकिन इस साल एक भी जोड़ा नजर नहीं आया है।

अध्ययन में कहा गया है कि प्रस्तावित पनबिजली बांध से सारसों के रहने की जगह बदल जाएगी। बांध जेमिथांग घाटी में न्यामजंग चू नदी पर बनेगा। ये वही नदी है, जहां हर साल सारसों के जोड़े हिमालय की भारी सर्दी से बचने और अंडे देने पहुंचते हैं। जाड़ों में सारस नदी की तलहटी पर अंडे देते हैं और नदी के सूखे हिस्सों में आराम करने के साथ ही उथले हिस्से में भोजन तलाशते हैं.। नदी की तलहटी में अधिकतम 30 सेंटीमीटर पानी रहने पर सारसों को कोई नुकसान नहीं होता। पानी बढ़ने की स्थिति में ये इस इलाके से मुंह मोड़ लेंगे।

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