नई दिल्ली. युद्ध के दौरान लड़ाकू विमानों की आकाश में रहने की क्षमता को बढ़ाने के लिए भारत की वायुसेना आसमान में ईंधन भरने की क्षमता वाले टैंकर विमानों की कमी से जूझ रही है, इसलिए खरीद की औपचारिकताओं से परे वह पट्टे पर मिड-एयर रिफ्यूलर लेना चाहती है और इसके लिए उसने एयरबस तथा बोइंग से प्रस्ताव मांगे हैं।

वायुसेना के रिफ्यूलर बेड़े में अभी छह रूसी इल्यूसिन-78 टैंकर हैं। ये टैंकर 2003 में भारत को रूस से मिले थे लेकिन अब वे समस्याओं का सामना कर रहे हैं और आए दिन मरम्मत के लिए हैंगर पर टंगे रहते हैं। जानकारी के अनुसार भारतीय वायुसेना ने अमेरिका की विमानन कंपनी बोइंग और यूरोपीय एयरोस्पेस की दिग्गज एयरबस से पट्टे के प्रस्ताव मांगे हैं। एयरबस से दो और बोइंग से एक कोटेशन मांगा गया है।

माना जा रहा है कि भारत तीन हवाई टैंकर पट्टे पर ले सकता है और बाद में छह हवाई टैंकर खरीद की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। फिलहाल वायुसेना की नजर एयरबस के ट्विन इंजन ए330 पैसेंजर एयरक्राफ्ट के डेरिवेटिव ए330 मल्टी-रोल टैंकर ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट और बोइंग 767 पैसेंजर जेट के डेरिवेटिव केसी-46 टैंकर पर है। मीडिया में आई खबरों के अनुसार वायुसेना ने एयरबस टैंकर को अपने लिए पसंद किया है। बोइंग उसकी दूसरी पसंद है।

ज्ञात रहे कि पिछले साल नवंबर के बाद से भारतीय सशस्त्र बलों द्वारा यह रक्षा उपकरणों को पट्टे पर लेने का यह दूसरा मौका होगा। इससे पहले नौसेना ने अमेरिकी कंपनी जनरल एटॉमिक से दो सी गार्जियन ड्रोन पट्टे पर लिए थे। रक्षा उपकरणों को पट्टे पर लेना एक नया विकल्प है जिसे 2020 की रक्षा खरीद प्रक्रिया में शामिल किया गया है।

मिड-एयर रिफ्यूएलर्स वायु सेना के लिए बहुत जरूरी हैं क्योंकि वे लड़ाकू विमानों को रेंज-बढ़ाने की क्षमता प्रदान करते हैं। मिड-एयर रिफ्यूएलर्स के साथ पायलट लंबी दूरी तक हमले कर सकते हैं और बार-बार जमीन पर उतरने और ईंधन भरने की आवश्यकता के बिना लंबे समय तक उड़ान भर सकते हैं।

जानकारों के अनुसार राफेल विमान में लंबी दूरी की क्षमता है क्योंकि उसमें बीच हवा में फिर से ईंधन भरा जा सकता है। तेजस एमके-1ए भी इसी क्षमता से लैस है। भारतीय वायुसेना 2007 से ही छह मिड-एयर रिफ्यूएलर हासिल करने की कोशिश कर रही है।

भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल आर.के. भदौरिया ने अपनी वार्षिक प्रेस कांफ्रेस में कहा था कि आईएएफ रिफ्यूएलर पट्टे पर ले सकती है क्योंकि टैंकरों की खरीद की योजना सालों बाद भी किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाई है। राफेल विमानों की पहली खेप पिछले साल जुलाई में फ्रांसीसी वायु सेना के दो ए330 एमआरटीटी के साथ उड़ान भरकर भारत पहुंची थी, जिन्होंने उसमें हवा में ईंधन भरने की सुविधा दी थी क्योंकि ये विमान फ्रांस के मेरिग्नैक से 8,500 किलोमीटर की दूरी तय करके यहां आए थे।

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