नई दिल्ली. यूरो और डालर कमाने वाला कश्मीरी गलीचा बुरे हाल में है। उससे भी बुरा हाल है उसके रंग, डिजाइन और बारीकी के लिए मशहूर कालीन बुनने वाले कारीगरों का जिनमें से अधिकांश इस कला को त्यागना चाहते हैं।

कश्मीरी हस्तकला का सशक्त हस्ताक्षर कश्मीरी गलीचा हाथ से बुना जाता है। कश्मीर में कालीन बुनने की शुरूआत 15वीं सदी में तब हुई जब कश्मीर के सुलतान जैनुल आबदीन ईरान से कालीन बुनने वाले कारीगर लाए थे। ऊन और तसर रेशम की गांठ डालकर बुनाई कश्मीरी कालीन को अलहदा बना देती है। गलीचे की बुनाई के लिए जिन औजारों का इस्तेमाल होता है उनमें लोहे का कंघा, ब्लेड और कैंची शामिल है। जिस करघे पर कालीन बुनी जाती है उसमें लकड़ी को दो बीम होते हैं। बीम अब धातु के भी बनते हैं।

कालीन बनाने के लिए जिस डिजाइन का इस्तेमाल होता है उसे तालीम कहते हैं। वह कागजों पर होता है। बुनाई के दौरान धागों के बीच टांगकर उसकी प्रतिकृति बनाई जाती है। कश्मीरी गलीचों के ज्यादा खरीदार जर्मनी सहित यूरोप के देशों में है लेकिन इन दिनों कालीन निर्यात में भारी गिरावट आई है। आंकडों के अनुसार 2014-15 में करीब 80 करोड़ का निर्यात हुआ था तो 2017-18 में ये गिरकर 22 करोड़ रह गया।

श्रीनगर के आलमगरी और गुलशन बाग इलाकों में ज्यादातर बुनकरों ने गलीचा बुनाई छोड़ दी है। जो बचे हैं वे बदहाल हैं। कालीन उद्योग पर कोरोना की मार भी पड़ी है। लॉकडाउन से तबाह कारोबार अभी तक पटरी पर नहीं आ पाया है।

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