नई दिल्ली. ब्लू वाटर नेवी की अवधारणा पर काम कर ही भारतीय नौसेना जल्द ही ऐसी नौसेना बन जाएगी जिसके पास तीन विमानवाहक पोत होंगे। अभी तक एशिया की किसी भी अन्य नौसेना के पास विमानवाहक पोत नहीं है। चीन ने हाल ही एक विमानवाहक पोत आपरेशनल किया है।

यद्यपि मौजूदा समय में सरकार का पूरा ध्यान पनडुब्बियों पर है। अभी भारतीय नौसेना रूस निर्मित आईएनएस विक्रमादित्य का इस्तेमाल करती है और दूसरा स्वदेश निर्मित विमानवाहक निर्माण के अंतिम चरण में है। सरकारी सूत्रों के अनुसार चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत तीसरे विमानवाहक से पहले नौसेना के लिए पनडुब्बियां हासिल करना जरूरी मानते हैं क्योंकि सतह पर तैरने वाले विमानवाहक उपग्रहों की नजर से नहीं बच सकते। वैसे माना जाता है कि वैश्विक परिदृश्य को देखते हुए हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी व्यापक मौजूदगी के लिए भारत के पास तीसरा विमानवाहक होना जरूरी है।

इधर नौसेना प्रमुख करमवीर सिंह ने पिछले दिनों वार्षिक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि नौसेना विमानवाहक की उपयोगिता को लेकर एकदम स्पष्ट है क्योंकि एयर ऑपरेशन नौसेना के अभियानों का अभिन्न अंग हैं और समुद्र में वायु शक्ति विमानवाहक से ही मिल सकती है। सिंह ने कहा था कि यदि आप बड़े सपने देखते हैं और जल्द से जल्द 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनना चाहते हैं तो आपको बाहरी दुनिया में संभावनाएं तलाशनी होंगी। देश नहीं चाहता कि नौसेना तटों के किनारे पर ही डटी रहे।

उन्होंने कहा कि तटीय क्षेत्रों से एयर ऑपरेशन सीमित क्षेत्र में ही चलाए जा सकते हैं और यही वह स्थिति है जहां विमानवाहकों की जरूरत पड़ती है। होर्मुज के जलडमरूमध्य से लेकर रीयूनियन आइसलैंड तक, पूर्वी अफ्रीका से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक और लोम्बेन जलडमरूमध्य से मलक्का जलडमरूमध्य तक पूरे हिंद महासागर के इर्द-गिर्द वाले देशों तक नौसेना की पहुंच जरूरी है। उन्होंने कहा कि यह विशाल समुद्री विस्तार भारतीय क्षेत्र से संचालित लड़ाकू विमानों की क्षमता से परे है। वे इस क्षेत्र का बमुश्किल 20 फीसदी हिस्सा ही कवर कर सकते हैं।

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