बीस शहीदों की आत्मा को भी पहुंचेगा कष्ट

नई दिल्ली. भारतीय थलसेना के एक पूर्व कमांडर का मत है कि पूर्वी लद्दाख के कैलाश रेंज पर कब्जे को छोड़ने से भारत फिर चीन के चंगुल में फंस जाएगा क्योंकि एक बार वहां से हटने के बाद उस पर फिर से कब्जा करना सम्भव नहीं रह पाएगा।

बता दें कि अगस्त में बिना आग्नेय अस्त्रों के हुए संघर्ष में भारतीय सेना के 20 अधिकारी और जवानों के शहीद होने के बाद भारतीय सेना ने उस कैलाश रेंज की चोटियों पर कब्जा कर लिया था जहां से चीनी पीएलए की तमाम टुकडियां भारतीय सेना की मार की जद में आ गई हैं और इसी के चलते अब चीन इस फिराक में है कि वह दोनों देशों के वरिष्ठ कमांडरों की नवीं वार्ता में किसी भी तरह से कैलाश रेंज से भारतीय सेना की टुकडियों को हटने के लिए राजी कर ले। कैलाश रेंज और पैंगोंग त्सो के उत्तर के इलाके से भारत अगर अपनी सैनिक टुकडियां हटा लेगा तो फिर वह चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी को चुनौती तक देने की स्थिति में नहीं रह जाएगा।

उत्तरी कमान के कई वर्ष तक कमांडर रहे रिटायर लेफ्टिनेंट जनरल एचएस पनाग ने एक लेख में कहा है कि इस तरह का कोई भी समझौता चीन को अपना राजनीतिक उद्देश्य प्राप्त करने में सक्षम बना देगा और भारत उस लाभ को खो देगा जो उसने कैलाश रेंज पर कब्जा करके पाया है।

चीनी सेना ने अप्रैल के अंत और मई की शुरुआत में लद्दाख में कई स्थानों पर घुसपैठ करके भारत सहित दुनिया को चौंका दिया था। उसने अपनी 1959 क्लेम लाइन पर दावा पेश करने के लिए दो मैकेनाइज्ड डिवीजन तैनात कर दिए।

इससे भारत को अंतरराष्ट्रीय, क्षेत्रीय स्तर पर न सिर्फ नीचा देखना पड़ा बल्कि उसकी सैन्य प्रतिष्ठा पर भी दाग लग गया। चीन ने 1950 के दशक में कई सामरिक क्षेत्रों पर कब्जा करने के बाद 1962 के युद्ध में अतिरिक्त इलाकों पर नियंत्रण करके स्वयं की स्थिति बेहद मजबूत कर ली थी। लेकिन 1967 में नाथुला और 1986-87 में सुमदोरोंग चू में विवाद से भारतीय सेना ने चीनी सेना को यह दर्शा दिया कि उसकी ऐसी हरकतों का जवाब पूरी मजबूती से मिलेगा।

असल में भारत ने जैसे ही देपसांग मैदान, गलवान घाटी, गोगरा-हॉट स्प्रिंग्स-कुगरंग नदी, पैंगोंग त्सो और चुमार के इलाकों में बुनियादी ढांचे का तेजी से विकास शुरू किया तो चीन को यह चिंता सताने लगी कि इससे अक्साई चिन इलाके को खतरा उत्पन्न हो सकता है।

अब चीन सीमित युद्ध थोपकर देसपांग मैदान-डीबीओ, गलवान-श्योक नदी जंक्शन तक के क्षेत्र, पैंगोंग त्सो के उत्तरी किनारे तक के सारे इलाके, कैलाश रेंज तथा लद्दाख रेंज तक सिंधु घाटी पर कब्जा करने के लक्ष्य के साथ वर्षों बाद मैदान में आया है। लेकिन 29-30 अगस्त की रात कैलाश रेंज पर नियंत्रण करके भारतीय सेना ने चीन कदमों को थमने पर मजबूर कर दिया है। कैलाश रेंज पर नियंत्रण के कारण, देपसांग मैदान और पैंगोंग त्सो के उत्तरी इलाके में भूभाग के सीमित नुकसान के बावजूद चीनी सेना को आगे बढ़ने से रोक देना भारतीय सेना की बड़ी सफलता है और इससे उसने अपनी खोई हुई सैन्य प्रतिष्ठा को भी बहाल कर लिया है।

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