ब्रिगेडियर उस्मान ने ठुकरा दिया था पाकिस्तानी थलसेनाध्यक्ष का पद

नई दिल्ली. उसने पाकिस्तानी थलसेनाध्यक्ष का पद ठुकरा कर तिरंगे को सलामी दी। झल्लाए पाकिस्तान ने उसके सिर पर 50 हजार का इनाम रख दिया। उसके नाम से पाकिस्तानी सेना थर्राती थी।उसने पाकिस्तान के साथ हुई पहली जंग में कश्मीर के रणनीतिक महत्व के दो इलाके झांगर और कोट पाकिस्तानी मोर्चेबंदी को ध्वस्त करके जीत लिए।

सेना के रिकार्ड के अनुसार ब्रिगेडियर उस्मान को ‘नौशेरा का शेर’ कहा जाता है। ब्रिगेडियर उस्मान 15 जुलाई 1912 को उत्तर प्रदेश, आज़मगढ़ के बीबीपुर में एक सैन्य परिवार में पैदा हुए। उनके पिता पुलिस अधिकारी और चाचा सेना में ब्रिगेडियर थे। कमीशंड होने के बाद उस्मान ने बलूच रेजिमेंट में आज़ादी तक सेवाएं दीं। बंटवारे के दौरान पाकिस्तान उन्हें सेनाध्यक्ष बनाना चाहता था,ब्रिगेडियर ने पेशकश ठुकरा दी और भारतीय सेना में रहना पसंद किया।

900 शव छोड़कर भाग गए कबायली

दिसंबर 1947 में ब्रिगेडियर उस्मान ने नौशेरा में उसी 50 (स्वतंत्र) पैराशूट ब्रिगेड की कमान हाथ में ली जिसने युद्ध के दौरान इलाके में कबाइलियों की चढ़ाई रोक दी थी। उनकी कमान में भारत ने झांगर छीन लिया। युद्ध के दौरान नौशेरा में जनरल करियप्पा ने मोर्चाबंदी का मुआयना करने के बाद ब्रिगेडियर उस्मान से कहा कि कोट को ​सिक्योर किया जाना है। दो दिन बाद उस्मान ने उस स्थान पर हमला कर दिया। कोट पर कब्ज़ा हो जाने के बाद जवानों ने दुश्मन को बुरी शिकस्त दी। इससे डरा दुश्मन 900 मृतकों को छोड़कर भाग गया।

उनकी सैन्य उपलब्धियों के चलते पाकिस्तान ने उनके सर पर 50,000 रुपए का इनाम घोषित कर दिया। 3 जुलाई 1948 को उनकी नौशेरा में दुश्मन का एक गोला फट जाने से मौत हो गई।

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