नई दिल्ली. कोविड-19 के अनुभवों ने सिद्ध कर दिया है कि भारत को अब स्वास्थ्य क्षेत्र को प्राथमिकता देनी ही होगी अन्यथा महामारियों की मार से देशवासियों को बचाने में दिक्कतें पेश आएंगी। यूरोपीय देशों में जीडीपी के छह से सात प्रतिशत खर्च के मुकाबले भारत का डेढ प्रतिशत स्वास्थ्य क्षेत्र की बीमारी को दूर करने में सक्षम नहीं है। देश को इसे तत्काल दोगुना अर्थात तीन फीसदी करने की जरूरत है।
ये राय नीति आयोग के सदस्य वी के पॉल की है। उनका कहना है कि देश में स्वास्थ्य क्षेत्र पर कुल मिलाकर खर्च कम है और स्थिति ‘ठीक करना’ जरूरी है।

खल रही है संसाधनों की कमी

इसके लिए केंद्र तथा राज्य सरकारों को स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ाने के लिए कहा जाए। कोविड-19 का जो अनुभव है, वह इसका औचित्य सिद्ध करेगा। उद्योग मंडल सीआईआई के ‘ऑनलाइन’ कार्यक्रम में पॉल ने कहा कि भारत का स्वास्थ्य क्षेत्र पर खर्च कम है। संसाधनों की कमी है। कुल मिलाकर स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च कम है और इसे ठीक करने की जरूरत है।

तीन प्रतिशत होना चाहिए खर्च

देश का 2018-19 में स्वास्थ्य क्षेत्र पर खर्च सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 1.5 प्रतिशत था। स्वास्थ्य क्षेत्र पर जीडीपी का 1.5 प्रतिशत खर्च संतोषजनक नहीं है। यूरोपीय देश स्वास्थ्य क्षेत्र पर जीडीपी का 7 से 8 प्रतिशत खर्च करते हैं। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन दस्तावेज का हवाला देते हुए कहा कि भारत का स्वास्थ्य क्षेत्र पर खर्च 2025 तक जीडीपी का 3 प्रतिशत होना चाहिए।

बड़े अस्पतालों पर ध्यान दे निजी क्षेत्र

कोविड-19 के अनुभव को देखते हुए स्वास्थ्य संबंधी ढांचागत सुविधाओं को मजबूत बनाने की जरूरत है। पॉल केंद्र सरकार के कोरोना वायरस महामारी से निपटने के लिये किये जा रहे विभिन्न प्रयासों में समन्वय करने वाले प्रमुख अधिकारी हैं।उन्होंने सुझाव दिया कि सरकार प्राथमिक स्वास्थ्य क्षेत्र पर ध्यान दे सकती है जबकि निजी क्षेत्र को अपेक्षाकृत बड़े और विशेष इलाज वाले अस्पतालों तथा सुविधाओं पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।
बड़े अस्पताल और विशेष इलाज के क्षेत्र में विस्तार की काफी संभावना है। पिछले छह साल में मेडिकल कॉलेज की संख्या में 45 प्रतिशत वृद्धि हुई है। स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर पर मेडिकल सीटों की संख्या में क्रमश: 48 प्रतिशत और 79 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। अगले तीन साल में 114 नए सरकारी अस्पताल बनेंगे।

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