भारत में नहीं उगता हींग का पौधा

नई दिल्ली. क्या आप जानते हैं कि जिस हींग का सदियों से आपके रसोईघर पर कब्जा है, वह भारत में पैदा नहीं होती और उसे पौधों से निकाला जाता है? भारत में खाई जाने वाली हींग अफगानिस्तान, ईरान इत्यादि ठंडे देशों में पैदा होती है। हालांकि भारत के हिमाचल में इसकी खेती की शुरूआत की गई है लेकिन अभी भी रसोइयों में विदेशी हींग का ही कब्जा है।

हींग का इस्तेमाल पूरे भारत में बड़े पैमाने पर होता है। यह पाचक की तरह उपयोग किया जाता है। हाल ही हिमाचल प्रदेश में हींग की खेती शुरू हुई है। यह पहली बार है जब भारत में हींग की खेती हो रही है। हिमाचल के लाहौल स्पीति क्षेत्र में हींग की खेती शुरू की गई है।

भारतीय एक साल में खा जाते हैं 1200 टन हींग

एक अनुमान के मुताबिक दुनिया में पैदा होने वाले हींग का 40 प्रतिशत भारत में इस्तेमाल होता है। हींग ईरान, अफ़ग़ानिस्तान और उज़्बेकिस्तान, कज़ाख़स्तान से आयात की जाती है। भारत 1,200 टन हींग सालाना आयात करता है। हींग का पौधा ठंडे और शुष्क वातावरण में पैदा होता है। हींग की क़रीब 130 किस्में हैं लेकिन मुख्य किस्म फेरुला एसाफोइटीडा भारत में सबसे ज्यादा उपयोग में आती है। एक पौधे से क़रीब आधा किलो हींग निकलता है। भारत में शुद्ध हींग की क़ीमत क़रीब 35 से 40 हज़ार रुपये प्रति किलो है। हींग फेरुला एसाफोइटीडा के जड़ से निकाले गए रस से तैयार किया जाता है। दो तरह के हींग काबुली सफ़ेद और लाल में से सफ़ेद हींग पानी में घुल जाता है। लाल या काला हींग तेल में घुलता है।

पित्त बढ़ाता है हींग

कच्चे हींग की गंध बहुत तीखी होती है इसलिए उसे खाने लायक नहीं माना जाता। गोंद और स्टार्च को मिलाकर उसे छोटे-छोटे टुकड़ों में खाने लायक ​बनाया जाता है। संस्कृत में हींग को हींगू के नाम से जाना जाता है। आयुर्वेद में हींग को शरीर के वात और कफ को ठीक करने वाला बताया गया है लेकिन यह पित्त को भी बढ़ाता है। गर्म तासीर वाला हींग भूख स्वाद बढ़ाता है। आयुर्वेद में सबसे पुरानी किताब चरक संहिता में हींग का ज़िक्र है। आयुर्वेद के अनुसार हींग पाचन में सहायक है। इससे गैस की समस्या कम होती है। कुछ लोग हींग को डेविल्स डंग कहते हैं। खाने के साथ मिलाने पर इसकी गंध थोड़ी कम हो जाती है।

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