हाथियों का हिमालय की तलहटी वाला घर बनेगा कंक्रीट का जंगल

नई दिल्ली. धार्मिक प्रतीकों का राजनीति में सफलता से उपयोग कर रहे राजनीतिक दलों की पीठ पर बैठे पूंजीपतियों की नजर अब गजराज पर पड़ गई है। इसी के चलते कई दशक से संकट का सामना कर रहे गजराज अर्थात हाथियों को अब उत्तराखंड के शिवालिक एलीफेंट कॉरिडोर से खदेड़ा जाएगा क्योंकि राज्य सरकार ने हिमालय की तलहटी में 5409 वर्ग किलोमीटर में फैले हाथियों के घर को गैर अधिसूचित करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। प्रस्ताव पर केन्द्र सरकार की अंतिम मुहर का इंतजार है जिसके बाद हाथियों को यहां से खदेडे जाने की शुरूआत हो जाएगी।

हिमालय की तलहटी के इस एलीफेन्ट रिजर्व में करीब 2000 हाथियों का बसेरा है। उत्तराखंड सरकार ने ये फैसला विकास योजनाओं के लिये वन भूमि के हस्तांतरण को आसान बनाने के लिए किया है। भारत में हाथियों के 30 अभयारण्य हैं, जिनमें 27,000 से अधिक हाथी रहते हैं। हाथियों को रहने के लिये विशाल क्षेत्र चाहिये क्योंकि विचरण के लिए उन्हें कई सौ किलोमीटर का इलाका चाहिए।

शिवालिक एलीफेन्ट रिजर्व को अक्टूबर 2002 में अधिसूचित किया गया था। यह देश का पहला एलीफेन्ट रिजर्व है जिसे गैरअधिसूचित किया गया है। उल्लेखनीय है कि दुनिया के 60 प्रतिशत एशियाई हाथी भारत में है। सरकार के आंकडो के मुताबिक 2014 और 2019 के बीच औसतन 102 हाथियों की सालाना अकाल मौत हुई। उत्तराखंड वन विभाग के मुताबिक पिछले 5 साल में 170 हाथी मरे।

वन्य जीव विशेषज्ञ हाथी को इकोसिस्टम इंजीनियर मानते हैं। खुश्क मौसम में हाथी विशाल दांतों से जमीन खोद कर पानी निकालते हैं जिससे दूसरे वन्य जीवों को भी प्यास बुझाने में सहूलियत होती है। गजराज घने जंगलों में दूसरे प्राणियों के लिये रास्ता तैयार करता है।

हाथियों के जंगल में चलने से उनके पैरों से गड्ढे बनते हैं जो सूक्ष्म जीवों का घर बन जाता है। इन गड्ढों में पानी भरने से टेडपोल को विकसित होने की जगह मिलती है। जंगल में कई वनस्पतियां ऐसी हैं जो हाथी के पाचन तन्त्र से गुजरने के बाद ही अंकुरित होती हैं और उनका बीज फैलता है।

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