नई दिल्ली. जिस गाय के मांस को लेकर आधुनिक भारत में तकरीबन आधा दर्जन से अधिक लिंचिंग (भीड द्वारा पीट-पीटकर हत्या) कर दी गई हो, उस भारत को यह जानकर जोर का झटका लगेगा कि हमारे पूर्वज अर्थात सिंधु घाटी सभ्यता के लोग जमकर बीफ खाते थे। इसके लिए वे गाय के बछड़े और बछड़ियों को चार साल तक हर हाल में जिंदा रखते थे।

बर्तनों के लिपिड अवशेष की जांच

जर्नल ऑफ आर्कियोलॉजिकल साइंस पत्रिका में छपे सिंधु घाटी सभ्यता पर हुए एक ताजा अध्ययन के नतीजों के अनुसार उस समय भोजन में मांस का वर्चस्व था और उसमें गो-मांस शामिल था। अध्ययन के नतीजे उस समय के बर्तनों में बचे लिपिड अवशेषों पर आधारित हैं। अध्ययन का नेतृत्व कैंब्रिज विश्वविद्यालय में पीएचडी स्कॉलर अक्षयेता सूर्यनारायण ने किया और जाने-माने पुरातत्वविद प्रोफेसर वसंत शिंडे और प्रोफेसर रविंद्र एन सिंह ने सहयोग किया।

सिर्फ दस फीसदी भेड़ के अवशेष

अध्ययन में हरियाणा और उत्तर प्रदेश में हड़प्पा से जुड़े स्थलों पर मिले मिट्टी के बर्तनों पाए गए वसा के अवशेषों का विश्लेषण किया गया। इसमें सूअरों, गाय-बैलों, भैंसों, भेड़-बकरियों जैसे पशु उत्पाद और डेरी उत्पादों के अवशेष मिले। अवशेषों में 50 से 60 प्रतिशत हड्डियां गाय, बैलों और भैंसों की मिली और 10 प्रतिशत हड्डियां भेड़ों और बकरियों की थीं।

हिरन, खरगोश, पक्षी, जलचर अवशेष भी मिले

ये इस बात का संकेत है कि सिंधु घाटी सभ्यताओं में बीफ खाना आम बात थी और भोजन का अधिकांश हिस्सा इसी से बनता था। हड़प्पा में 90 प्रतिशत गाय-बैलों को तीन, साढ़े तीन साल तक की उम्र तक जिन्दा रखा जाता था। मादा पशुओं को डेरी उत्पादन के लिए इस्तेमाल किया जाता था और नर पशु सामान खींचते थे। बर्तनों में कम मात्रा में हिरन, खरगोश, पक्षी और जलचरों के भी अवशेष मिले हैं। विशेष किस्म के मर्तबानों में वाइन और तेल भंडारण के संकेत मिले हैं। सिंधु घाटी सभ्यता आधुनिक पाकिस्तान, उत्तर-पश्चिमी और पश्चिमी भारत अफगानिस्तान में फैली हुई थी।

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