नई दिल्ली. पिछले छह साल से चिंताओं के भंवर में फंसी कांग्रेस को एक और चिंतन शिविर राहत प्रदान कर पाएगा! हाल ही कांग्रेस के असंतुष्टों के साथ हुई बैठक में एक और चिंतन शिविर आयोजन का फैसला किया गया था। पार्टी में चिंतन शिविर की परम्परा इंदिरा गांधी के जमाने में शुरू हुई थी।

कांग्रेस में चिंतन शिविर के दौरान नेताओं के कैंप में ठहरने और दो-तीन दिन तक अलग-अलग मुद्दों पर खुली चर्चा की पंरपरा है। अब तक के चिंतन शिविर कांग्रेस की दशा और दिशा बदलने में कारगर साबित हुए हैं।

शिमला में 2003 में हुए कांग्रेस के चिंतन शिविर में पार्टी ने केंद्र में गठबंधन की राजनीति को अपनाने का फ़ैसला किया था। इसके साथ ही 2004 में कांग्रेस की जीत का रास्ता खुल गया था और पार्टी ने दस साल तक गठबंधन की सरकार चलाई।

पार्टी का पहला चिंतन शिविर उत्तरप्रदेश के नरौरा में 1974 में लगाया गया था। दूसरा चिंतन शिविर 1998 में पचमढ़ी में हुआ। पचमढ़ी में कांग्रेस ने एकला चलो की नीति अपनाई। तीसरा चिंतन शिविर 2003 में शिमला में लगाया गया। इसी चिंतन शिविर में कांगेस ने एकला चलो की नीति त्यागकर गठबंधन राजनीति की राह पकड़ी और 2004 में सत्ता में वापसी कर ली।

जनवरी 2013 में जयपुर में चिंतन शिविर लगाया गया। लेकिन इसमें चिंतन कम और आलाकमान की चापलूसी ज़्यादा हुई थी। जयपुर में राहुल गांधी को पार्टी का उपाध्यक्ष बनाने का फैसला हुआ था।

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