नई दिल्ली. कड़ाके की ठंड उत्तरप्रदेश में ऑक्सीजन को जहरीला बना रही है क्योंकि प्रदेश में प्रतिबंधित पालीथीन और टायर खुलेआम जलाए जा रहे हैं। अलाव के तौर पर खुलेआम जल रहे टायर ट्यूब और पालीथीन की वजह से राज्य में वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। सार्वजनिक स्थानों पर पुराने टायर, ट्यूब, प्लास्टिक, पॉलीथिन और मोटर वाहन के खराब तेल का अलाव जलाने से टौक्सिक रसायन, पीएम 10 व 2.5 माइक्रोमीटर माप के छोटे कार्बन कण, बेंजीन, पारा, वैनेडियम तथा कैंसर फैलाने वाले डाईऔक्सिंस और फ्यूरियस हानिकारक गैसों का उत्सर्जन होता है।

वैसे भी पॉलीथिन के प्रयोग से रक्तचाप, नपुसंकता, अस्थमा, कैंसर और चर्म रोग जैसी घातक बीमारियां होने का खतरा रहता है। पॉलीथिन में कुछ घंटों तक रखी गई खाद्य सामग्री विषैली हो जाती है। इन रसायनों से डीएनए खराब होने पर मानसिक रोग की संभावनाएं बढ जाती है। डाईओक्सिंस गैस दूसरे हानिकारक तत्वों तथा रसायनों की अपेक्षा 10 हजार गुना घातक हैं।

वर्ष 2017 में सत्ता संभालने के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पॉलिथीन बैग्स के उपयोग पर प्रभावी प्रतिबंध लगाने के निर्देश दिए थे। जुलाई 2018 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्देश के अनुसार एक बार फिर पॉलिथीन और प्लास्टिक उत्पादों पर प्रतिबंध लगाने का आदेश दिया गया था। अधिकारियों से कहा गया था कि प्लास्टिक के गिलास और पॉलिथीन थैली किसी भी सूरत में बाजार में नहीं दिखने चाहिए। आदेश में 50 माइक्रोन से कम मोटाई वाली पॉलिथीन बनाने वाली फैक्ट्रियों को सील करने के भी निर्देश दिए गए थे। लेकिन कुछ दिनों की सख्ती के बाद पॉलिथीन से बाजार फिर गुलजार हो गए। उच्च न्यायालय द्वारा फिर से इस बारे में जवाब-तलब करने के बाद सरकार एक बार फिर सक्रिय हुई और मई और जून को पॉलिथीन पर प्रतिबंध के एक के बाद दो आदेश जारी किए गए।

आदेशों के बेअसर होने के बाद 31 अगस्त 2019 को अतिरिक्त मुख्य सचिव गृह अवनीश अवस्थी ने कहा था कि एक सितंबर से यदि पॉलिथीन बैग बाजार में दिखते हैं तो उसकी जिम्मेदारी संबंधित थाने और जिम्मेदार अधिकारियों की होगी। दोषी अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। लेकिन समय गुजरने के साथ साथ एक बार फिर पॉलिथीन ने बाजार और घरों पर कब्जा जमा लिया। इससे पहले वर्ष 2016 में अखिलेश यादव सरकार भी पालीथीन पर प्रतिबंध लगाने संबंधी प्रस्ताव को मंत्रिमंडल की बैठक में बाकायदा मंजूरी दे चुकी है।

पर्यावरणविद मानते है कि पॉलीथिन को नष्ट होने में लगभग सौ वर्ष लगते हैं। तब तक यह पर्यावरण को नुकसान पहुंचाती रहती है। नाले या सीवर लाइन में पड़ी होने के कारण पानी की निकासी में बाधा आती है। जिसमें गंदा पानी वहीं रुका रहता है। गंदे पानी से हैजा, मलेरिया जैसी बीमारियां फैलने का खतरा बना रहता है। एक मिलीमीटर मोटाई से अधिक पॉलीथिन जल्दी नष्ट हो जाती है। जिसके बनाने पर रोक नहीं है। एक मिलीमीटर से कम मोटाई वाली पॉलीथिन जल्दी नष्ट नहीं होती है और इनका प्रयोग ही सबसे अधिक हो रहा है।

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