आंदोलनरत किसानों की आशंका

नई दिल्ली. महाराष्ट्र समेत देश के अन्य हिस्सों का किसान नए कृषि कानूनों के विरोध में आंदोलित नहीं है। जबकि पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तरप्रदेश का किसान सड़कों पर उतर आया है। सवाल है कि किसानों की इतनी ज़बरदस्त नाराज़गी पंजाब और हरियाणा में ही क्यों दिख रही है? पश्चिम और दक्षिण राज्यों में क्यों नहीं?

मंडी सिस्टम दिलाता है न्यूनतम समर्थन मूल्य

जवाब है कि हरित क्रांति के कारण कृषि और आर्थिक सिस्टम सभी प्रांतों में अलग-अलग हैं। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में धान और गेहूं ज्यादा उगाए जाते हैं। देश की छह हजार एपीएमसी मंडियों में से दो हजार से अधिक केवल पंजाब में है। यहाँ के किसानों को गेहूं और चावल के दाम बिहार, मध्य प्रदेश और दूसरे कई राज्यों से कहीं अधिक मिलते है। मंडी सिस्टम की वजह से सरकार किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य देने के लिए बाध्य है।

मंडियों के निजी हाथों में सौंपे जाने का खतरा

न्यूनतम समर्थन मूल्य पाने वाले इन किसानों को डर है कि नए क़ानून के तहत एपीएमसी निजी हाथों में चली जाएगी और एफसीआई का निजीकरण कर दिया जाएगा। देश भर में कुल किसानों की आबादी में छोटे किसानों का हिस्सा 86 प्रतिशत से अधिक है और वो इतने कमज़ोर हैं कि प्राइवेट व्यापारी उनका शोषण आसानी से कर सकते हैं। किसानों और उनके संगठनों का कहना है कि देश के किसानों की औसत मासिक आय 6,400 रुपये के क़रीब है। नए क़ानूनों में उनकी आर्थिक सुरक्षा तोड़ दी गई हैं और उन्हें कॉर्पोरेट के हवाले कर दिया गया है।

ठेके पर खेती से डरे हुए हैं किसान

आंदोलनरत किसानों का मानना है कि नए कृषि क़ानूनों से भारत में कृषि और किसानों का भविष्य अंधकारमय हो जाएगा। वे मानते हैं कि एपीएमसी और कॉन्ट्रैक्ट फ़ार्मिंग या ठेके पर की जाने वाली खेती सबसे घातक है। कॉन्ट्रैक्ट फ़ार्मिंग के तहत बहुराष्ट्रीय कंपनियां एक तालुका या गांव के सभी किसानों की ज़मीने ठेके पर ले सकती हैं और एकतरफ़ा फ़ैसला कर सकती हैं कि कौनसी फ़सल उगानी है। किसान इनके बंधुआ मज़दूर बन कर रह जाएंगे। सरकार ने नए क़ानून लाकर कृषि क्षेत्र का निगमीकरण करने की कोशिश की है और इसे भी अंबानी-अडानी और मल्टीनेशनल कंपनियों के हवाले कर दिया है।

आशंका है कि निजी कॉर्पोरेट कंपनियां जब आएँगी तो उत्पाद में मूल्य संवर्धन करेंगी, जिसका लाभ केवल उन्हें होगा। छोटे किसानों को नहीं। उदाहरण के लिए ब्रांडेड बासमती चावल मूल्य संवर्धन के साथ बाज़ार में उतारे जाने के बाद 150 से लेकर 2200 रुपए किलो तक बिकते हैं और उन्हें उगाने वाले किसानों को एक किलो के केवल 20-30 रुपये ही मिलेंगे।

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