नई दिल्ली. नई तकनीकों के दम पर रात के अंधकार से लड़ रहे कृत्रिम प्रकाश ने पूरी दुनिया को ऐसे संकट में झोंक दिया है कि जिसका परिणाम खेतों को बंजर बना सकता है। कृत्रिम प्रकाश के दुष्प्रभावों का अध्ययन करने वाले एक से अधिक शोध का कहना है कि इस प्रदूषण से इंसान, जीव-जंतु और पेड़ पौधे प्रभावित हो रहे हैं। इंसानों की नींद भी कम हो रही है। खराब पाचन कैंसर, मधुमेह, मोटापा जैसी बीमारियों की ओर धकेल रहा है।

बदल सकता है जीवनचक्र

जर्नल ऑफ नेचर इकोलॉजी एंड इवोल्यूशन में प्रकाशित एक शोधपत्र में वैज्ञानिकों ने कहा है कि रात को दिन में बदलने की इंसानों की जिद पशु-पक्षियों और वनस्पतियों को निगल रही है। दुनिया में प्रकाश प्रदूषण पर लगाम नहीं डाली गई तो इंसानों, जानवरों और पेड़-पौधों का जीवन चक्र बदल सकता है। वैज्ञानिकों ने कहा है कि कस्बों और शहरों को रोशन रखने के के लिए जिन एलईडी का उपयोग किया जा रहा है, वे बेहद घातक हैं। प्रकाश प्रदूषण के चलते कीट और पतंगे विलुप्ति के कगार तक आ पहुंचे हैं। बहुत सारे कीट केवल रात में उड़ते हैं और फूलों का परागण करते हैं। प्रकाश के चलते ये कीट परागण नहीं कर पाते क्योंकि इसके लिए उन्हें अंधेरे की जरूरत होती है। ज्यादातर कीट रोशनी के पास जाते ही झुलस कर मर जाते हैं। इससे रात में आसमान में तारे दिखने बंद हो जाते हैं, उपग्रहों से रात में पृथ्वी का चित्र लेने में बाधा पड़ रही है और साथ ही बिजली की बर्बादी भी हो रही है।

गायब हो रही है नींद

प्रकृतिविदों का मानना है कि प्रकाश प्रदूषण खतरनाक है। प्रकाश प्रदूषण पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) पर खतरनाक असर डाल रहा है जिससे इंसानों और जानवरों की नींद लेने की प्राकृतिक प्रक्रिया प्रभावित हो रही है। कीटों, मछलियों, चमगादड़ों, चिड़ियों एवं अन्य जानवरों की प्रवासन प्रक्रिया भी प्रभावित हो रही है।

नींद के हार्मोन रिसाव का चक्र भी बदला

विश्व की 70 प्रतिशत आबादी प्रकाश प्रदूषण की जद में है। विकसित देशों की 98 प्रतिशत आबादी प्रकाश प्रदूषण के पंजे में हैं। भारत के दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता जैसे बड़े शहर भी प्रकाश प्रदूषण को अपना मेहमान बना चुके हैं। इसका सबसे ज्यादा दुष्प्रभाव मनुष्य पर है। इंसानी शारीरिक गतिविधियां शरीर के अन्दर स्थित, पृथ्वी के रातदिन के साथ लयबद्ध, 24 घन्टों वाली मस्तिष्क के हाइपोथैलेमस नामक हिस्से मौजूद घड़ी से नियंत्रित होती हैं। रात का समय होते ही शरीर की क्रियाएं धीमी पड़ने लगती है। नींद के हार्मोन का रिसाव होने लगता है। समय पर नहीं सोने से शरीर की लय गड़बड़ा जाती है। इसके दुष्प्रभाव से पाचन क्रिया गड़बड़ाने लगती है। पेट में अल्सर की संभावना बढ़ जाती है। कैंसर, मधुमेह, मोटापा आदि भी शरीर में घुसने का मौका तलाशने लगते हैं। थका-थका रहने वाला शरीर मस्तिष्क में चिड़चिड़ापन बढ़ाता है।

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