दौड़ में है चुनावों में पार्टी की नैया डुबोने वाले कई नेता

नई दिल्ली. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चुनावी फार्मूलों का मुकाबला करने में नाकाम कांग्रेस के हवाई लीडर अब उस कुर्सी पर कब्जा जमाने के लिए लॉबिंग में जुट गए हैं, जो अहमद पटेल के निधन से खाली हुई है। इन हवाई लीडरों में कई ऐसे नाम हैं जो प्रभारी सचिव और महासचिव रहते हुए विभिन्न प्रदेशों के विधानसभा चुनावों में पार्टी की नैया को डुबो चुके हैं।

पार्टी सूत्रों के अनुसार अहमद पटेल को ऐसे समय में पार्टी कोषाध्यक्ष बनाया गया था जब मुम्बई के उद्योगपतियों से जुड़ी हुई पार्टी की धन सम्बंधी सप्लाई लाइन बाधित हो गई थी और पार्टी को सामान्य खर्च चलाने तक में दिक्कत आने लगी थी।

पार्टी के शीर्ष पर हवाई लीडरों का वर्चस्व

पार्टी 2014 के बाद से ही जनता की बेरुखी का सामना कर रही है और नेतृत्व पार्टी को फिर से मुकाबले में खड़ी करने में नाकाम सिद्ध हो रहा है। हालांकि इसके लिए जनता से ज्यादा पार्टी दोषी है जिसके शीर्ष पर हवाई नेताओं का कब्जा है और पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी उन्हें जमीन पर जाकर जनता की नब्ज टटोलने के लिए बाध्य नहीं कर सके। वर्षों तक पार्टी महासचिव की कुर्सी पर काबिज रहे एक हवाई लीडर ने सच्चाई बयान करते हुए कहा कि पार्टी को फिर से खड़ी का ​करने का जिम्मा गांधी परिवार के पास है। शेष नेता तो उनके पीछे चलकर सत्ता का स्वाद चखने के लिए हैं। अब ये गांधी परिवार पर है कि वह अपने आसपास हवाई लीडरों को रखे या फिर जनमत में पैठ रखने वाले नेताओं को अहमियत दे।

जिसने उड़ीसा हराया, वह भी दावेदार

पार्टी सूत्रों का कहना है कि अगला कोषाध्यक्ष कौन होगा, इसका अंदाजा राहुल गांधी की पसंद के आधार पर लगाना मुश्किल काम नहीं है। उनको केरल के गैर हिंदीभाषी केसी वेणुगोपाल, हरियाणा विधानसभा का चुनाव हार चुके रणदीप सुरजेवाला, गुजरात में पार्टी को एकजुट रखने में नाकाम राजीव सातव, उडीसा में पार्टी को डुबोकर अब असम के प्रभारी बनाए गए राजस्थान के जितेन्द्र सिंह जैसे लोग ज्यादा पसंद हैं जो उनके सामने बोलने की हिम्मत नहीं करते। ऐसे में वे किसी जनाधार वाले नेता को कोषाध्यक्ष बनने देंगे, इसकी उम्मीद कम ही है। इसके अलावा वे कनिष्क सिंह भी उनकी पसंद हैं जो हिसाब-किताब में माहिर हैं लेकिन उद्योग जगत में उनकी पैठ चींटी जितनी भी नहीं है।

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