नई दिल्ली. पिछड़े तबके के छात्रों की स्कॉलरशिप योजनाएं समय पर भुगतान नहीं होने से गरीब बच्चों की परेशानी का सबब बन गई हैं।
देश में फिलहाल 70 लाख दलित छात्र केंद्र सरकार की स्कॉलरशिप के पात्र हैं। लेकिन केंद्रीय सामाजिक न्याय मंत्रालय की स्थायी संसदीय समिति की रिपोर्ट के अनुसार योजना के तहत 60.29 लाख दलित छात्रों को ही स्कॉलरशिप मिलती है। वर्ष 2018 में नियमों में बदलाव कर स्कॉलरशिप में राज्यों को हिस्सा बढ़ा दिया गया था।

इसके आवेदन की प्रक्रिया बेहद जटिल है। केंद्र सरकार इन योजनाओं को आवंटित की जाने वाली रकम में भी कटौती कर रही है। चालू वित्त वर्ष में इन योजनाओं के लिए करीब 30 अरब रुपये का प्रावधान है, लेकिन अब तक 11 अरब रुपये ही जारी किए गए हैं। सोलह राज्यों के अलावा बाकी अब तक इंतजार कर रहे हैं। बिहार को तो इस मद में सिर्फ 2.30 लाख रुपये ही मिले हैं।

केंद्रीय आदिवासी कल्याण मंत्रालय ने वर्ष 2019-20 की वार्षिक रिपोर्ट कहती है कि स्कॉलरशिप के पात्र छात्रों के चयन और सत्यापन की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है। इसके साथ ही समय पर इस रकम का भुगतान भी उनकी जिम्मेदारी है। जबकि नियंत्रक व महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने वर्ष 2018 में अनुसूचित जाति के लिए पोस्ट-मैट्रिक स्कॉलरशिप योजना पर कहा था कि वर्ष 2012 से 2017 के बीच पंजाब, महाराष्ट्र, तमिलनाडु व उत्तर प्रदेश में 18.5 लाख छात्रों को स्कॉलरशिप की रकम के भुगतान में एक से छह साल तक की देरी हुई थी।

आवेदन जमा करने, उनकी जांच और अनुमोदन के लिए समयसीमा नहीं होना इसकी प्रमुख वजह थी। केंद्र को समय पर छात्रों के आंकड़े मुहैया नहीं कराना भी देरी का कारण है। केंद्र की ओर से इस मद में आवंटित रकम पर्याप्त नहीं होती और इस राज्यों का वित्तीय प्रबंधन भी ठीक नहीं है। केंद्र की ओर समय पर पूरी रकम का भुगतान नहीं होने की वजह से बकाया रकम लगातार बढ़ रही है। शिक्षाविदों का कहना है कि सरकार को इन योजनाओं की प्रक्रिया को सरल बना कर राज्य सरकारों के सहयोग से समय पर रकम जारी करनी चाहिए।

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