नई दिल्ली. देश में औसतन हर घर में महीने में साढ़े चार से पांच किलो प्याज़ की खपत होती है। यदि प्याज़ के दाम में दस बीस रुपए बढ़ते भी हैं तो प्रत्येक परिवार का महीने में सौ-दो सौ रुपए तक का ख़र्च बढ़ जाता है और इसी के चलते सरकारें उसके दाम नियंत्रित रखने की कोशिश करती हैं क्योंकि विपक्षी पार्टियां उसके दामों को मुद्दा बना देती हैं।

वैसे भी गेहूं को छोड़कर खाने की अधिकतर ज़रूरी चीज़ों के खुदरा मूल्यों में बढ़ोतरी थम नहीं रही है। आलू के दामों में पिछले एक साल में 92 फ़ीसदी और प्याज़ के दाम 44 फ़ीसदी बढ़ गए हैं।

उपभोक्ता मामलात मंत्रालय के आंकडों के मुताबिक प्याज़ के औसत थोक दामों में 108 फ़ीसदी की बढ़त दर्ज की गई है। एक साल में प्याज़ के दाम 1,739 रुपये प्रति क्विंटल से बढ़कर 3,633 रुपये प्रति क्विंटल पर पहुंच चुके हैं। माना जाता है कि खेती की शुरुआत से पहले हमारे पूर्वज जंगली प्याज़ खाते थे। चरक संहिता में प्याज़ को दवा बताते हुए इसे दिल आंखों और जोड़ों के लिए फ़ायदेमंद बताया गया है। ये सब्ज़ी कई स्वरूपों में खाई जाती है। लोग प्याज़ के साथ ही रोटी खा लेते हैं।

सलाद से लेकर सब्जी और बिरयानी से लेकर कोरमे तक के लिए ज़रूरी प्याज़ के दाम बढ़ते ही राजनीतिक पारा चढ़ने लगता है। सितंबर-अक्टूबर में हर साल प्याज़ के दाम बढ़ते है क्योंकि कई इलाक़ों में बारिश की वजह से फसल ख़राब हो जाती है जिससे आपूर्ति प्रभावित होती है। इन दिनों मंडी में प्याज़ कम आ रहा है।
पिछले साल सितंबर में दिल्ली में प्याज़ 65 रुपए से लेकर 80 रुपए प्रति किलो तक बिका था। साल 2015 से लेकर 2018 तक प्याज़ के दाम 10 रुपए प्रति किलो से लेकर 20 रुपए प्रति किलो के बीच ही रहे थे। इससे पहले साल 2013 में प्याज़ के दाम बढ़कर 80 रुपए प्रति किलो तक पहुंच गए थे।

निर्यात पर रोक का असर नहीं

भारत सरकार ने बढ़ते दामों को नियंत्रित करने के लिए प्याज़ के निर्यात पर रोक लगा दी है। सरकार को उम्मीद है कि इससे प्याज़ के दामों में कमी आएगी। जब-जब प्याज़ के दाम बढ़ते हैं इस पर राजनीति भी तेज़ हो जाती है। बिहार में चुनाव के चलते सरकार नहीं चाहती कि प्याज़ की महंगाई मुद्दा बने, क्योंकि प्याज़ के दामों का राजनीति को प्रभावित करने का इतिहास रहा है। 1980 में भूतपूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को दोबारा सत्ता दिलाने में प्याज़ ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उस वक़्त इंदिरा गांधी ने प्याज़ की बढ़ी हुई क़ीमतों को तत्कालीन सरकार की नाकामी के तौर पर पेश किया था।

प्याज़ ऐसी सब्ज़ी है जिसका लम्बे समय के लिए भंडारण किया जा सकता है। किसान भी दाम बढ़ने की उम्मीद में प्याज़ का भंडारण करते हैं। लेकिन हर बार उन्हें मनमाफिक दाम नहीं मिल पाते। साल 2018 में किसानों का प्याज़ पचास पैसे प्रति किलो भी नहीं बिका और किसानों को सड़क पर ही प्याज़ फेंकना पड़ा।

देश में प्याज़ का कुल उत्पादन क़रीब 2 करोड़ 50 लाख मीट्रिक टन से 2 करोड़ 25 लाख मीट्रिक टन के बीच है। हर साल कम से कम डेढ़ करोड़ मीट्रिक टन प्याज़ बेचा जाता है और क़रीब 10 से 20 हज़ार मीट्रिक टन प्याज़ भंडारण के दौरान ख़राब हो जाता है या उसका वज़न कम हो जाता है। करीब 35 हज़ार मीट्रिक टन प्याज़ निर्यात किया जाता है।

कृषि विशेषज्ञ प्याज़ के दामों में बढ़ोत्तरी की वजह फसल ख़राब होना नहीं बल्कि व्यापारियों की जमाखोरी को मानते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन के साथ ही स्टॉक की सीमा हटा दी गई। सरकार अब ये भी नहीं जान पाएगी कि किसके पास कितना स्टॉक है।

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