सुभाष राज

नई दिल्ली. संसद के दोनों सदनों के साथ ही विधान सभाओं तथा विधान परिषदों के संचालन के लिए चुने जाने वाले अध्यक्ष ज्यादातर वे नेता बनाए जाते हैं, जिनके सपने केन्द्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री बनने के होते हैं लेकिन किसी न किसी दुर्गुण, कमी अथवा राजनीतिक हालात के कारण वे उन पदों को हासिल नहीं कर पाते हैं।

चूंकि सत्ताधारी दल में किसी न किसी कारण से वे वरिष्ठ नेता कहलाने लगते हैं, इसलिए सरकार को असंतुष्ट गतिविधियों से बचाने के लिए उन्हें ये कहकर अध्यक्ष बना दिया जाता है कि अमुक नेता भले ही मुख्यमंत्री हों अथवा केन्द्रीय मंत्री, प्रोटोकॉल के चलते सदन में उसे भी उनके आदेशों को मानना पड़ेगा।

सत्ता में सीधी हिस्सेदारी (मंत्री, मुख्यमंत्री बनना) से वंचित होने पर ‘मरता क्या न करता’ की मानसिक हालत में पहुंचे नेता पीठासीन अध्यक्ष बनना मंजूर कर लेते हैं। चूंकि दुनिया के हर इंसान की तरह उनको भी ये भ्रम होता है कि ये समाज और व्यवस्था उनके टैलेंट को नहीं समझती अन्यथा मुख्यमंत्री-केन्द्रीय मंत्री तो उन्हें होना चाहिए था।

इस भ्रम के चलते संसद और विधानसभा सत्र के दौरान 24 घंटे उनका खून खौलता रहता है। इस मनस्थिति में वे नियमों की कठोरता से पालना कराने का व्रत ले लेते हैं और हर उस माननीय सदस्य, मंत्री (मुख्यमंत्री को छोड़कर) को उसकी हैसियत दिखाते रहते हैं, जिसकी बॉडी लेंग्वेज उन्हें चिढ़ा दे। राजस्थान समेत लगभग सभी विधानसभाओं का यही हाल है, जहां पीठासीन अध्यक्ष निर्वाचित सदस्यों को लगभग हर सत्र में फटकारते हैं और मजबूर जनप्रतिनिधि उनकी तानाशाही सहन करते हैं।

जबकि संविधान विशेषज्ञाें का कहना है कि सदन के पीठासीन अधिकारी सदस्‍यों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने के लिए बाध्‍य हैं और यही उनकी पहली तथा अंतिम जिम्‍मेदारी है.

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