नई दिल्ली. सर्दियां शुरू हो चुकी हैं और उन्हें देखते हुए हमें कई बदलाव करने होंगे। सर्दियों के लिए आयुर्वेद में विशेष दिनचर्या बताई गई है। इनका पालन कर कई बीमारियों से बचा जा सकता है।

आयुर्वेद के अनुसार साल के सभी मौसम में फिट रहने के लिए हर मौसम के गुण और त्रिदोष यानी वात, पित्त और कफ पर उनके असर के बारे में जानना जरूरी है। सर्दियों वात बढ़ जाता है क्योंकि वातावरण सूखा, हवाओं वाला और ठंडा होता है। सर्दियों में जब गीलापन और ठंड होती है तो कफ इकट्ठा हो जाता है। गर्मी में नमी पित्त बढ़ता है। गर्मी में जब पित्त बढ़ा हुआ होता है तो ठंडक पहुंचाने वाले भोजन और पेय फायदेमंद रहते हैं और ठंड में वात या कफ बढ़े हुए होते हैं तो गर्मी देने वाला भोजन मुफीद रहता है। मौसम के अनुरूप भोजन जरूरी होता है। जिस मौसम में जो सब्जियां, अनाज और फल होते हैं, उस मौसम में उनका सेवन सेहत के लिए अच्छा होता है।

हजम हो जाता है लक्कड़-पत्थर

पहले खानपान में ऋतुचर्या का पालन आसान था क्योंकि सिर्फ मौसमी चीजें ही उपलब्ध होती थीं, लेकिन अब हर मौसम में हर चीज मिल रही है, इसलिए भोजन में असंतुलन हो रहा है। बढ़े हुए दोष को आहार और ऐसी जीवनशैली जो उस दोष के विपरीत हो, उसे अपनाकर कम किया जाता है। सर्दियों में पाचन की शक्ति यानी जठराग्नि काफी मजबूत होती है। ये अग्नि तेल, वसा, दूध से बनी चीजें जैसे घी, पनीर, खोवा आसानी से पचा लेती है।

नहीं खाएं छोटी मछलियां और दही से बनाएं दूरी

सर्दियों में कफ का संचय रोकने के लिए अदरक, काली मिर्च, तुलसी का पत्ता, शहद, च्यवनप्राश लेना चाहिए। ठंड में रोजाना कम से कम 8 से 10 ग्लास गुनगुना पानी जरूर पीएं। ठंड में सूखा हुआ मांस और छोटी मछलियां, दही और ठंडी चीजें नहीं लेनी चाहिए। तीखी, कड़वी, कसैली और हल्की चीजें खाने से बचना चाहिए।

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