बेबाक बात…

-सुभाष राज :

भारत के सरकारी नेताओं को इन दिनों सुप्रीम कोर्ट को मर्यादा का पाठ पढ़ाने का दौरा पड़ा है. कभी कोई मंत्री सुप्रीम कोर्ट को मर्यादा में रहने की नसीहत दे देता है तो कभी किसी पार्टी का बड़ा लीडर उसे लक्ष्मण रेखा पार नहीं करने को कह देता है. इन दिनों विधायिका के पीठासीन अधिकारी भी सुप्रीम कोर्ट को घुडक रहे हैं कि वह कौन होता है संसद के बनाए कानून की समीक्षा करने वाला! ऐसा नहीं है कि ये दक्षिण पंथी नरेन्द्र मोदी सरकार के जमाने में ही हो रहा है. जब कांग्रेस सत्ता में थी तो वह भी चाहती थी कि सुप्रीम कोर्ट उसके सामने उसी तरह पूंछ हिलाए जिस तरह कार्यपालिका उसके समक्ष नतमस्तक रहती है. उसके स्याह सफेद की ओर अंगुली नहीं उठाए और नागरिकों के संवैधानिक और मानव अधिकारों को कुचलने की उसकी कुत्सित कोशिशों की ओर से आंख मूंद लें.

चूंकि विधायिकाओं के पीठासीन अधिकारी और सरकार का सुप्रीम कोर्ट के साथ सौत जैसा रिश्ता है क्योंकि संविधान ने सुप्रीम कोर्ट को कार्यपालिका और विधायिका के गैरकानूनी कृत्यों पर नजर रखने और उनके बनाए कानूनों को पलटने तथा रद्द करने का अधिकार दे रखा है, इसलिए उनकी आलोचना को बहुत अधिक महत्व देने की आवश्यकता नहीं है लेकिन राज्यसभा के पीठासीन सभापति की हैसियत से देश के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने बेहद आपत्तिजनक भाषा में ये कहकर संविधान पर हमला किया है कि सुप्रीम कोर्ट कौन होता है संसद के बनाए कानूनों की समीक्षा करने वाला.

ऐसा कहकर उपराष्ट्रपति ने स्वयं को ही कठघरे में खड़ा कर लिया है क्योंकि निधन और अन्यान्य कारण से राष्ट्रपति की कुर्सी खाली होने पर उपराष्ट्रपति को ही राष्ट्रपति के अधिकार और कर्तव्यों का निर्वहन करना होता है. उन्हीं राष्ट्रपति को संविधान ने ये अधिकार दिया है कि वे किसी भी कानून अथवा अन्य किसी कारण से विवाद उत्पन्न होने पर सुप्रीम कोर्ट को ही मामला रैफर करके ये बताने को कहते हैं कि वह संविधान सम्मत है अथवा नहीं. लेकिन उपराष्ट्रपति ने राज्यसभा सभापति की हैसियत से सरकार के सुर में सुर मिलाकर साबित कर दिया है कि हमारे संविधान निर्माताओं ने 75 साल पहले सुप्रीम कोर्ट को संसद के बनाए कानूनों की समीक्षा करने का अधिकार देकर गलत नहीं किया. शायद उनकी दूरदृष्टि ने उन्हें उसी वक्त बता दिया था कि भारत में ऐसे नेता चुनकर आ सकते हैं जो लोकतांत्रिक होने का ढोंग जरूर करेंगे लेकिन मूलत: उनकी प्रवृत्ति सामन्ती होगी.

वैसे तो राज्यसभा के माननीय सभापति जगदीप धनखड़ साहब को संविधान के भाग वी में अनुच्छेद 124 से 147 में वर्णित सुप्रीम कोर्ट के अधिकार और कर्तव्यों की याद दिलाने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि वे स्वयं एक ख्यातिप्राप्त अधिवक्ता रह चुके हैं. संविधान ने न्यायिक समीक्षा की शक्ति के साथ सुप्रीम कोर्ट को संविधान का अंतिम व्याख्याकार, मौलिक अधिकारों का रक्षक नियुक्त किया है. इसके अलावा उसने संविधान के मूल ढांचे में संशोधन के अधिकार से संसद को वंचित भी किया है.

तो बेहतर होता कि माननीय उपराष्ट्रपति राज्यसभा सभापति की हैसियत से जयपुर में हो रहे पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन में सुप्रीम कोर्ट के समीक्षा के अधिकार पर सवाल खड़ा करने की अपेक्षा विधायिका को ये संदेश देने की कोशिश करते कि वह नागरिकों के मौलिक अधिकारों और उनके मानवाधिकारों का उल्लंघन करने वाले कानून बनाने से बचे क्योंकि संविधान निर्माता सुप्रीम कोर्ट को संविधान का संरक्षक नियुक्त कर गए हैं.

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