पश्चिमी उत्तरप्रदेश के खेतों का हाल

नई दिल्ली. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गन्ने की कटाई-छिलाई के साथ-साथ गेहूं बोने का मौसम चल रहा है लेकिन उनके खेत सन्नाटे में डूबे हुए हैं। क्योंकि मेरठ, बाग़पत, मुज़फ़्फ़रनगर, शामली, सहारनपुर जैसे ज़िलों के किसान दिल्ली सीमा पर नए कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ चल रहे प्रदर्शन ( Farmers Agitation) में हिस्सा ले रहे हैं।

शामली ज़िले में ट्रैक्टर पर गन्ने लादकर जा रहे एक किसान ने मीडिया के इस सवाल पर कि आप प्रदर्शन में नहीं गए? तपाक से कहा कि गए थे। अभी हमारे भाई हैं वहां पर। सरकार नहीं मानी हमारी बात और आंदोलन आगे चला तो फिर चले जाएंगे। किसान का कहना था कि घर में पशु भी हैं। उन्हें कौन देखेगा? इसीलिए हर घर से लोग बारी-बारी से वहां जा रहे हैं। किसान का कहना था कि जीवन ठीक से चल रहा है लेकिन नए क़ानून से किसानों का बहुत नुक़सान होगा।

किसानों का कहना है कि सरकार ने पक्का कानून नहीं बनाया। सरकार तो आती-जाती रहेगी लेकिन क़ानून पक्का रहेगा तो उसे कोई छेड़ नहीं पाएगा। किसानों के कहने पर भी सरकार इसे पक्का नहीं कर रही है, मतलब, उसकी नीयत में खोट है। खेती का तो बहुत नुक़सान हो रहा है, फिर भी किसान डटे हुए हैं, क्योंकि ये क़ानून तो किसानों का भविष्य ही चौपट कर देगा। नए कृषि क़ानून ( Agriculture Laws ) के ख़िलाफ़ पश्चिमी यूपी के कई ज़िलों से बड़ी संख्या में किसान दिल्ली बार्डर पर पहुंचे हैं और जगह-जगह सड़कों पर धरना प्रदर्शन चल रहा है।

एक किसान ने सरकार के लिए कहा कि मानैगी जी मानैगी, नहीं मानौगी तो जाएगी कहां। देश भर का किसान डटा है वहां। रेल बंद नहीं तो इतने किसान एकत्रिता हो जाते कि सरकार की सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाती। देर-सबेर सरकार की समझ में आएगा ही कि जिन किसानों ने उसकी सरकार बनाई वह उन्हीं किसानों का नुक़सान करने जा रही है।

असल में क़ानून को लेकर नाराज़ किसानों ने देखा कि हरियाणा-पंजाब के किसान डटे हुए हैं तो ये लोग भी पहुंचने लगे। किसानों का कहना है कि पास किए हुए कानून तो ठीक हैं लेकिन डर ये है कि एमएसपी ख़त्म न कर दें।

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