मध्यप्रदेश में काल के गाल में समाए 290 बाघ

नई दिल्ली. जंगल का राजा ‘बाघ’ इन दिनों हलकान है क्योंकि उसके घर की देखभाल करने वाली मध्यप्रदेश सरकार यह कहकर अपनी पीठ खुद थपथपा रही है कि उसके जंगलों में 526 बाघ हैं लेकिन वह पिछले 19 साल में मारे गए 290 बाघों के मरने का अफसोस करने की अपेक्षा यह कहकर वाहवाही लूटने की कोशिश कर रही है कि मारे गए बाघ बूढ़े और अशक्त थे।
उसने बाघों की देखभाल करने वाले अफसरों से यह कहलवाया है कि जंगलों में बाघिन जमकर बच्चे पैदा कर रही है, इसलिए मारे गए बाघों के लिए शोक करना उचित नहीं है। टाइगर स्टेट का दर्जा प्राप्त मध्यप्रदेश में बीते लगभग 19 वर्षों में 290 बाघों की मौत के बाद भी वर्तमान में राज्य में बाघों की संख्या बढ़कर 675 से अधिक हो गई है, जिनमें 550 वयस्क बाघ एवं 125 से अधिक शावक शामिल हैं।

मध्यप्रदेश में वर्ष 2002 से नवंबर, 2020 तक 290 बाघों की मौत हुई है। इतने बाघों के मरने के बाद भी समूचे मध्यप्रदेश में 550 वयस्क बाघ हैं। राज्य के छह बाघ अभयारण्यों बांधवगढ़, कान्हा, पेंच, सतपुड़ा, पन्ना एवं संजय में 125 बाघ शावक हैं। इन शावकों के अतिरिक्त भी प्रदेश के अन्य खुले जंगलों में भी 10 से 20 बाघ शावक होने की उम्मीद है।

हर साल मर जाते हैं दो दर्जन से अधिक बाघ

अधिकारियों का कहना है कि प्रदेश में बहुत ज्यादा बाघ हो गये हैं। इसलिए उनमें क्षेत्र को लेकर आपसी संघर्ष बढ़ रहा है। हर साल 25 से 30 बाघ मरते हैं। जबकि पांच प्रतिशत बाघों का शिकार हो जाता है। कई बाघ इंसानों की ओर से रखे गए जहर और करंट से मारे जाते हैं। बाघ की जंगल में उम्र 12 से 13 साल की है।

बाघ प्राकृतिक कारणों से और आपसी लड़ाई में भी मरते हैं। गौरतलब है कि 31 जुलाई 2019 को जारी राष्ट्रीय बाघ आकलन रिपोर्ट के अनुसार 526 बाघों के साथ मध्यप्रदेश ने प्रतिष्ठित ‘टाइगर स्टेट’ का अपना खोया हुआ दर्जा फिर से हासिल कर लिया है। 2006 में मध्यप्रदेश में 300 बाघ थे लेकिन शिकार आदि के चलते 2010 में बाघों की संख्या घटकर 257 रह गई थी। 2014 में मध्यप्रदेश में बाघों की संख्या बढ़कर 308 हो गई। राष्ट्रीय बाघ आकलन रिपोर्ट 2018 के अनुसार देश में सबसे अधिक 526 बाघ मध्यप्रदेश में थे, जबकि कर्नाटक 524 बाघों के साथ दूसरे स्थान पर है।

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