नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने विवाह के लिए धर्मांतरण के खिलाफ उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखंड के कानूनों की वैधानिकता को चुनौती दी जाने वाली याचिकाओं पर दोनों राज्य सरकारों से जबाव मांगा है।

विशाल ठाकरे एवं अन्य के साथ ही सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सितलवाड़ के गैर-सरकारी संगठन ‘सिटीजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस’ की याचिकाओं की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश शरद अरविंद बोबडे, न्यायमूर्ति वी रमासुब्रमण्यम और न्यायमूर्ति ए एस बोपन्ना की खंडपीठ ने की।

सुनवाई के दौरान संबंधित कानून के उन प्रावधानों पर रोक लगाने से इनकार कर दिया, जिसके तहत शादी के लिए धर्म परिवर्तन की पूर्व अनुमति को आवश्यक बनाया गया है। वरिष्ठ अधिवक्ता चंदर उदय सिंह ने दलील दी कि पूर्व अनुमति के प्रावधान दमनकारी हैं। उत्तर प्रदेश के अध्यादेश के आधार पर पुलिस ने कथित लव जिहाद के मामले में निर्दोष लोगों को गिरफ्तार किया है।

सुनवाई की शुरुआत में न्यायमूर्ति बोबडे ने याचिकाकर्ताओं को उच्च न्यायालय जाने को कहा, लेकिन सिंह और वकील प्रदीप कुमार यादव की दलील थी कि दो राज्यों में यह कानून लागू हुआ है और समाज में इससे व्यापक समस्या पैदा हो रही है। मध्य प्रदेश और हरियाणा जैसे अन्य राज्य भी ऐसे ही कानून बनाने पर विचार कर रहे हैं। इसके बाद न्यायालय ने मामले की सुनवाई को लेकर हामी भरते हुए दोनों राज्य सरकारों को नोटिस जारी कर दिए।

उधर राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने उच्चत्तम न्यायालय से आशा जताई कि उसे किसानों के हित में संज्ञान लेकर न्याय करना चाहिए। गहलोत ने सोशल मीडिया के जरिए कहा कि अगर उच्चत्तम न्यायालय कृषि कानूनों को रद्द करने का फैसला सुना दे तो किसानों का आंदोलन भी तुरंत समाप्त हो सकता है। 42 दिन से अपना घर छोड़ ठंड और बारिश में बैठे किसानों के हित में न्यायालय को संज्ञान लेना चाहिए। अब तक 50 किसानों की मौत इस आंदोलन में हो चुकी है।

पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट ने कहा है कि जब किसानों ने शुरू से ही स्पष्ट कर दिया था कि ये कानून कृषि एवं किसानों के विरुद्ध हैं तो केंद्र सरकार क्यों बार-बार वार्ता के नाम पर किसानों को गुमराह करने की कोशिश कर रही है।

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