नई दिल्ली. आखिरकार वही हुआ जिसका अंदेशा था। दिल्ली को घेरे बैठे किसानों के साथ वार्ता का दिखावा कर रही केन्द्र सरकार की मंशा के अनुरूप कई याचिकाकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए हैं। याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र एवं राज्यों को नोटिस जारी किया है। शीर्ष अदालत ने संकेत दिया कि वह विवाद सुलझाने के लिए देशभर के किसान संगठनों और सरकार के प्रतिनिधियों की एक समिति गठित कर सकती है।

कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को आदेश दिया है कि वे प्रदर्शनकारी किसान यूनियनों को भी पक्षकार बनाएं। मामले की अगली सुनवाई 17 दिसम्बर को होगी। सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सरकार किसानों के हितों के खिलाफ कुछ नहीं करेगी। अदालत ने केंद्र से कहा कि प्रदर्शनकारी किसानों के साथ बातचीत से कोई लाभ नहीं हुआ और ऐसा लग रहा है कि ये जल्द ही राष्ट्रीय मुद्दा बन जाएगा।

दिल्ली की अलग-अलग सीमाओं पर बीते 21 दिनों से किसान प्रदर्शन कर रहे हैं। उनकी प्रमुख मांग तीन कृषि कानूनों को रद्द करने की है। इस बाबत सरकार और किसान संगठनों के बीच कई दौर की वार्ता भी हो चुकी है लेकिन नतीजा अभी तक नहीं निकला है। सरकार बारम्बार दोहरा रही है कि तीनों कानून किसानों के हित में है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दावा है कि कुछ लोग किसानों को भ्रमित कर रहे हैं। उधर किसान संगठनों ने सरकार के कृषि कानून में संशोधनों के प्रस्ताव को खारिज कर दिया है।
उल्लेखनीय है कि केन्द्र सरकार सितंबर में पारित किए तीन नए कृषि कानूनों को कृषि क्षेत्र में बड़े सुधार के तौर पर पेश कर रही है। जबकि किसानों को आशंका है कि नए कानूनों से एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) और मंडी व्यवस्था खत्म हो जाएगी और वे बड़े कॉरपोरेट पर निर्भर हो जाएंगे।

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