हडप्पाकालीन सभ्यता के शहर धोलावीरा के नष्ट होने का भी यही कारण था

नई दिल्ली. अगर भयावह सूखा नहीं पड़ता तो भारत की सरस्वती नदी लुप्त नहीं होती। पुराविदों ने कच्छ के रण में होकर बहने वाली सरस्वती नदी के लुप्त होने और हडप्पाकालीन सभ्यता के शहर धोलावीरा के नष्ट होने के बीच के सम्बंध का रहस्य सुलझाने का दावा किया है। पुराविदों ने कई अध्ययनों के बाद यह ढूंढ निकाला है कि 4000 साल पहले सरस्वती नदी और प्राचीन शहर धोलावीरा कैसे गायब हो गए? उनका कहना है कि हिमालय से निकल कर गुजरात के कच्छ रण तक बहने वाली सरस्वती नदी का लुप्त होना ही हड़प्पा सभ्यता के प्रमुख शहर धोलावीरा के नष्ट होने की प्रमुख वजह थी? भारतीय रिसर्चरों का यह निष्कर्ष विली जर्नल के ताजा अंक में छपा है।

मैंग्रोव पेड़ों की छाया में रहती थी हड़प्पा सभ्यता

आईआईटी खड़गपुर की रिसर्च टीम ने कच्छ के रण स्थित हड़प्पाकालीन शहर धोलावीरा के विकास और पतन की कड़ियों और रण में बहने वाली नदी के आपसी संबंधों की खोज के दौरान पाया कि लुप्त हुई नदी सरस्वती से मिलती-जुलती है। इस शहर की खुदाई में हड़प्पाकालीन सभ्यता और संस्कृति के ढेरों अवशेष मिले हैं। शोध के दौरान मिले आंकड़ों के अनुसार रण में किसी जमाने में मैंग्रोव पेड़ भी थे और सिंधु की सहायक नदियों की ओर थार मरुस्थल के दक्षिण में स्थित कच्छ में भारी मात्रा में पानी मिलता था। पहली बार कच्छ में बहने वाली इस हिमाच्छादित नदी का प्रत्यक्ष प्रमाण मिला है. यह सरस्वती नदी जैसी है और रण के पास बहती थी।

पाइपलाइन से लाते थे घरों तक पानी

हड़प्पा में मिले मानव कंगन के कार्बोनेट्स और ‘फिश ओटोलिथ’ की जांच के आधार पर कहा गया है कि यह स्थान साढ़े पांच हजार साल पहले यानी हड़प्पा काल से पहले से लेकर हड़प्पा काल के दौरान तक बसा हुआ था। शोध से पता चला है कि धोलावीरा का 4400 साल पहले तक विस्तार हुआ। लगभग चार हजार साल पहले अचानक इसका पतन हो गया। शोधकर्ताओं का कहना है कि धोलावीरा में रहने वाले लोगों ने बांध, जलाशय और पाइपलाइन बना कर जल संरक्षण की बेहतरीन नीति अपनाई थी। लेकिन नदी के सूख जाने की वजह से इलाके में भयावह सूखे जैसी स्थिति का सामना करने में वह लोग नाकाम रहे।

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