नई दिल्ली. आखिर हो क्या रहा है कि पिछले तीस माह में भारत के पांच बड़े वित्तीय संस्थान रसातल में चले गए। क्या बैंकिंग क्षेत्र का नियामक भारतीय रिजर्व बैंक निगरानी की ज़िम्मेदारी ठीक से नहीं निभा रहा है?

असल में वित्तीय संस्थानों की सेहत को पहला झटका 2018 में इन्फ्रास्ट्रक्चर लीज़िग एंड फाइनेंशियल सर्विसेज नामक एक नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी के पास नकदी की भारी कमी आने से लगा। जांच में पाया गया कि शैडो बैंक ने ऐसे ऋणदाताओं को पैसा उधार दिए जिनकी कोई साख नहीं थी। फिर दीवान हाउसिंग फाइनेंस कॉर्पोरेशन (डीएचएफएल) भी इसी हश्र को प्राप्त हुआ। आईएलएंडएफसी की स्थिति देखकर बैंक सतर्क हो गए और उन्होंने पैसे देना बंद कर दिया, जिससे 2018 की दूसरी छमाही में लिक्विडिटी की कमी होने लगी। इसी दौरान खबरें आईं कि बैंक के प्रमोटरों ने 31,000 करोड़ रुपये का गबन कर लिया।

सितंबर 2019 में पंजाब और महाराष्ट्र सहकारी (पीएमसी) बैंक घोटाला सामने आ गया। बैंक अधिकारियों ने हाउसिंग डेवलपमेंट एंड इंफ्रास्ट्रक्चर (एचडीआईएल) को 2500 करोड़ रुपये दिए और कर्ज़ चुकाने में नाकामी के बाद भी बैंक के चेयरमैन एस वार्यान सिंह को 96.5 करोड़ रुपये का पर्सनल लोन और दे दिया गया। मार्च 2020 में बैंक यस बैंक भी इसी राह पर गया तो जमाकर्ताओं ने बैंक से पैसा निकालना शुरू कर दिया। यस बैंक पहले ही बढ़ते नॉन परफॉर्मिंग एसेट, एनबीएफसी संकट और गवर्नेंस से जुड़े मसलों से जूझ रहा था। 17 नवंबर 2020 को लक्ष्मी विलास बैंक भी आखिरी सांस गिनने लगा। लेकिन आरबीआई सिर्फ यस बैंक और एलवीबी का मसला सुलझा सका। पीएमसी बैंक का अब तक कोई समाधान नहीं निकल पाया है।

कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि आरबीआई को बैंकों की ब्याज दर निर्धारण और बैंकों की निगरानी की अपनी भूमिका को अलग करना चाहिए। एक बैंकर के अनुसार रिजर्व बैंक संकेतों को नहीं देखता है। बैंक रातों-रात विफल नहीं होते, वो धीरे-धीरे विफल होते हैं। आरबीआई अपनी स्वायत्तता खो चुका है। ऑल इंडिया बैंक एम्प्लाइज़ यूनियन (AIBEA) के महासचिव, सी एच वेंकटचलम के मुताबिक आरबीआई ने स्वायत्त निकाय की तरह काम करना बंद कर दिया है। वह केंद्र के राजनीतिक प्रशासन का एक्सटेंशन काउंटर बन गया है।

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