अपनी भारत जोड़ो यात्रा के दौरान कांग्रेस नेता राहुल गांधी करीब 13 बार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर चीनी सीमा पर कमजोरी दिखाने के आरोप जड चुके हैं. वे बारम्बार कह रहे हैं कि नरेन्द्र मोदी की वजह से चीनी सेना हमारे जवानों को पीट रही है. राहुल गांधी जो कह रहे हैं, वह सच है अथवा सिर्फ राजनीति. ये जानने के लिए करीब साठ साल पहले चीनी सेना के हाथों तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के जमाने में मिली शर्मनाक पराजय से लेकर आज तक के हालात को गहराई से देखना होगा.

असल में 1962 में चीनी सेना के हाथों करारी पराजय झेल चुके भारत की सेना ने पिछले तीन साल में लाइन आफ एक्चुअल कंट्रोल पर लाल सेना को करारा जवाब दिया है लेकिन इस मामले में राजनीतिक नेतृत्व के अपरिक्वव बयानों ने वास्तविक नियंत्रण रेखा पर हालात को काफी पेचीदा बना दिया है. चूंकि भारत का नेतृत्व घरेलू राजनीतिक दवाब के कारण सीमा पर ना कोई आया और ना ही कोई गया बयान दे चुका है, इसलिए चीन कमांडर स्तर की बैठकों के साथ ही कूटनीतिक मीटिंगों में ये स्वीकार नहीं करता कि उसकी सेना वास्तविक नियंत्रण रेखा पर घुसपैठ कर रही है. लेकिन हकीकत में उसकी सेना पूरे पूर्वी सेक्टर में घुसपैठ का मौका ढूंढता रहता है जिसका नतीजा 2020 की कंटीले तारों से हुए संघर्ष के अलावा 9 दिसंबर 2022 को अरुणाचल प्रदेश के तवांग सेक्टर में हिंसक झड़प के रूप में सामने आया है.

अरुणाचल प्रदेश के तवांग सेक्टर में नौ दिसंबर से पहले सैकड़ों चीनी सैनिकों ने सीमा पार करने की कोशिश की थी लेकिन भारतीय सेना ने इन प्रयासों को विफल कर दिया.चीनी सेना की ओर से अलग-अलग जगहों पर सीमा पार करने की ताज़ा कोशिशों की शुरुआत लद्दाख के वेस्टर्न सेक्टर में अप्रैल,2020 से हुई थी. चीनी मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को लेकर चीन की निश्चित धारणाएं हैं. वह मानता है कि भारत किसी छोटी घटना के बदले में व्यापक रूप से सैन्य पलटवार करने का फ़ैसला नहीं करेगा. हालांकि भारतीय सेना ने स्नो लेपर्ड ऑपरेशन के ज़रिए पेंगोंग त्सो झील से चीन को पीछे हटने के लिए मजबूर करके उसकी इस धारणा को तोड़ दिया है. भारत के इस ऑपरेशन ने ये स्पष्ट कर दिया है कि अगर एलएसी पर हालात अधिक खराब हुए तो भारत 1967 के नाथूला संघर्ष और 1987 के सुमदोरोंग चू घाटी भिड़ंत की तरह भारत चीन को एलएसी पर पीछे धकेलने के लिए मजबूर हो सकता है.

असल में मौजूदा हालात 2017 में डोकलाम में भारत और चीनी सेना के बीच तनाव के बाद शनै: शनै: बने हैं. चीन और भूटान के बीच बसा विवादित डोकलाम एक ऐसे त्रिकोण पर है जहां उत्तर में चीनी क़ब्ज़े वाली तिब्बत की चुंबा घाटी है, पूर्व में भूटान है और पश्चिम में सिक्किम है. 2017 में चीन इस क्षेत्र में सड़क बनाने की कोशिश कर रहा था. भारत ने इस कोशिश को नाकाम कर दिया क्योंकि इस सड़क का सीधा असर भारत के उस इलाक़े पर पड़ता जिसे ‘चिकेन-नेक’ के नाम से जाना जाता है. ये चिकन नेक उत्तर-पूर्वी राज्यों को एक-दूसरे से जोड़ता है.

सेना की अंदरूनी रिपोर्ट्स के अनुसार 2011 से लेकर साल 2018 के दौरान चीनी सेना ने हर साल 200 से 460 बार घुसपैठ की कोशिश की. 2019 में ये संख्या 663 बार हुई. चीनी सेना की घुसपैठ कोशिशों में बढ़ोतरी से चौकन्ने हुए भारत ने 73 सड़कों की पहचान करके इंडिया-चाइना बॉर्डर रोड्स प्रोजेक्ट बनाया और उन पर तेजी से काम किया जा रहा है. भारत की ये तेजी ही चीन को रास नहीं आ रही है और वह आए दिन भारतीय सेना की बांह मरोड़ने की कोशिश करता रहता है.

गलवान संघर्ष के बाद रक्षा मंत्रालय ने चीनी इरादों को खतरनाक मानते हुए जम्मू-कश्मीर का 55 मीटर लंबा बस्ती ब्रिज और उत्तराखंड से लगने वाली तिब्बत सीमा पर 24 किलोमीटर लंबी भैरों घाटी-नेलॉन्ग मार्ग खोलने के साथ ही नौ किलोमीटर से अधिक लंबे अटल टनल और निर्माणाधीन ज़ोजिला सुरंग मार्ग को भी खोल दिया है. भारत ने साल 2020 के बाद चीनी सीमा पर 60 हज़ार से ज़्यादा सैनिक तैनात कर रखे हैं.

इस बीच अरुणाचल के तवांग सेक्टर में दोनों सेनाओं के बीच फिर एक बार कंटीले तारों वाले हथियारों के साथ झड़प हुई जिसमें क़रीब 35 भारतीय सैनिक घायल हुए हैं. जिनमें से सात की हालत गंभीर है जिनका गुवाहाटी के सैनिक अस्पताल में इलाज चल रहा है.

तवांग सेक्टर में चीनी सैनिक घुसपैठ से सवाल उठ रहा है कि चीन ने यह क्यों किया और इसके ज़रिए वो क्या हासिल करना चाहता है. चीनी सीमा पर लगातार हो रही झड़पों के जो कारण बताए जा रहे हैं उनमें कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को ख़त्म किया जाना भी शामिल है. चीनी मामलों के जानकारों का कहना है कि धारा 370 समाप्त करने के भारत के फैसले को चीन ने अक्साई चिन पर कब्जे की भारत की पुरानी आकांक्षा को नई दिशा देने की कवायद माना है.

देखा जाए तो वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीनी सेना का सामना कर रहे भारत की स्थिति बहुत पेचीदा है. भारत चीन और पाकिस्तान का सामना करने के साथ ही कश्मीर में आतंकवाद से भी जूझना पड़ता है. चूंकि चीन, पाकिस्तान को हर मामले में सैन्य और आर्थिक मदद करता है और पाकिस्तान, चीन को अपने नौसैनिक अड्डे, पोर्ट और अरब सागर तक रास्ता दे रहा है. ऐसे में जब कभी वास्तविक युद्ध होगा तो भारत को अरब सागर तक चीनी सेना का सामना करना पड़ सकता है.

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