उपचुनाव परिणामों से मिलेंगे संकेत

नई दिल्ली. उत्तरप्रदेश में सात विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव के परिणाम तय करेंगे कि जनता पर विपक्ष के आंदोलनों का असर हुआ है अथवा नहीं। सियासी उठापटक के बीच आ रहे उपचुनाव के नतीजे भविष्य की सियासत के संकेत देंगे।

राज्यसभा चुनाव में सपा और बसपा के बीच जो कुछ हुआ, वह भी सियासी रूख तय करेगा। सत्ता पक्ष को लगता है कि राममंदिर के रूप में उसके पास मजबूत विकल्प मौजूद हैं। इन नतीजों से जहां कोरोना संकट के दौरान सरकार व भाजपा संगठन की तरफ से किए गए कामों के दावों का सच सामने आएगा, वहीं विपक्ष की तरफ से सरकार के खिलाफ उठाए गए मुद्दों का असर भी दिखेगा।

उपचुनाव के पहले प्रदेश में कई महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम हुए। जिनमें राज्यसभा चुनाव में नौ सदस्य निर्वाचित कराने की ताकत होते हुए भी भाजपा का सिर्फ आठ उम्मीदवार उतारने के साथ ही बसपा का आश्चर्यजनक तरीके से एक उम्मीदवार का पर्चा भरवाना तथा सपा का बसपा विधायकों में तोड़फोड़ कराना प्रमुख था।

क्या होगी सियासत की दिशा ?

उपचुनाव परिणाम से ये संकेत भी मिलेंगे कि प्रदेश के भविष्य की सियासत और सियासी पार्टियों के रिश्तों तथा उनके संभावित समीकरणों की दिशा व दशा क्या होगी। 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा, बसपा और कांग्रेस सियासी बिसात पर भाजपा के खिलाफ अपने मोहरे अलग-अलग ही चलने वाले हैं या कोई किसी से मिलकर खेल खेलेगा।

सेमीफाइनल है उपचुनाव

विश्लेषकों के अनुसार वैसे उपचुनाव को सत्ता पक्ष का माना जाता है। लेकिन 2022 में मुख्य चुनाव होने से इस उपचुनाव को सेमीफाइनल माना जा रहा है। अगर विपक्ष को सफलता मिलेगी तो कार्यकतार्ओं का मनोबल बढ़ेगा। ये चुनाव नतीजे सियासी सफर की तस्वीर को भी साफ करेगा। कुछ घटनाओं को लेकर विपक्ष की तरफ से ब्राह्मणों की उपेक्षा व उत्पीड़न को लेकर सरकार की घेराबंदी तथा हाथरस जैसी घटनाओं के सहारे विपक्ष, खास तौर से कांग्रेस व भीम आर्मी चीफ चंद्रशेखर की पार्टी का सरकार को कठघरे में खड़ा करना तथा कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर उठाए गए सवालों का जनता में असर भी इन नतीजों से सामने आएगा। इससे यह भी साफ हो जाएगा कि कांग्रेस के सड़कों पर संघर्ष तथा राहुल गांधी व प्रियंका गांधी वाड्रा की यूपी में सक्रियता का जनता में कुछ असर हुआ है या नहीं।

सड़कों पर उतरी कांगेस का भी पता चलेगा ग्राफ

अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली सपा स्वयं को स्वाभाविक रूप से मुख्य विपक्षी दल मानती है। पिछले लोकसभा चुनाव के नतीजों के आधार पर यह दावा बसपा भी करने लगी है। लेकिन इधर प्रियंका गांधी वाड्रा की कांग्रेस भी सड़क पर कूदकर अपनी दावेदारी मजबूत कर रही है। तीनों खुद को एक दूसरे पर बीस साबित करने के प्रयास में लगे है।

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