नई दिल्ली. पश्चिम बंगाल इन दिनों सियासी उफान से गुजर रहा है। लगभग तीस फीसदी मुस्लिम आबादी वाले इस राज्य में ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल-मुस्लिमीन () के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी की एंट्री इस उफान का कारण है। ओवैसी ने फुरफुरा शरीफ तीर्थस्थल संरक्षक सिद्दीकी परिवार के एक युवा पीरजादा अब्बासुद्दीन सिद्दीकी के साथ चुनावी गठबंधन की इच्छा जताकर तृणमूल कांग्रेस को चौंका दिया है। फुरफुरा शरीफ तीर्थस्थल बंगाल में सबसे लोकप्रिय तीर्थस्थलों में से एक है। यह पीर अबू बक्र सिद्दीकी के मकबरे के आसपास बनाया गया है। यहां 1375 में निर्मित एक मस्जिद भी है। फुरफुरा शरीफ उर्स त्योहार और पीर को समर्पित वार्षिक मेले के दौरान लाखों लोगों को आकर्षित करता है।

बंगाल की मुस्लिम आबादी 2011 की जनगणना के दौरान 27.01 प्रतिशत थी और अब बढ़कर लगभग 30 प्रतिशत होने का अनुमान है। मुस्लिम आबादी मुर्शिदाबाद (66.28), मालदा (51.27), उत्तर दिनाजपुर (49.92), दक्षिण 24 परगना (35.57), और बीरभूम (37.06) जिले में सर्वाधिक है। पूर्वी और पश्चिमी बर्दवान जिलों के साथ ही उत्तरी 24 परगना और नादिया में भी बड़ी संख्या में मुस्लिम मतदाता हैं।

दो पार्टियों के सर्वेक्षणों के अनुसार, मुस्लिम वोटों में स्विंग 120 विधानसभा सीटों के रूप में कई चुनाव परिणामों को प्रभावित कर सकता है। पश्चिम बंगाल इमाम्स एसोसिएशन के अनुसार बंगाल में सांप्रदायिक राजनीति के लिए कोई जगह नहीं है। बंगाल में लगभग 40,000 मस्जिदों में से कम से कम 26,000 मौलवी संघ की सदस्य हैं। चाहे हिंदू हों या मुसलमान, राज्य के लोगों की एक ही पहचान बंगाली है।

कोलकाता की सबसे बड़ी और सबसे महत्वपूर्ण नखोदा मस्जिद (जिसे आगरा में बादशाह अकबर के मकबरे की प्रतिकृति के रूप में एक शताब्दी पहले निर्मित कराया गया था) के इमाम मौलाना मो शफीक क़ासमी ने बयान दिया है कि कोई भी पार्टी धर्म की राजनीति का प्रचार करके लाभ नहीं उठा सकती है। उन्होंने कहा, “मैं एक धार्मिक व्यक्ति हूँ। मुझे नहीं पता कि मेरे जन्म से पहले राजनीति में क्या हुआ था लेकिन आज बंगाल के लोग स्वीकार नहीं करते हैं।

उल्लेखनीय है कि ओवैसी पर पिछले उत्तर प्रदेश और बिहार विधानसभा चुनावों में मुस्लिम वोटों को विभाजित करके भाजपा की मदद करने के आरोप सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी), कांग्रेस और वामपंथी दलों के साथ ही कई मौलवी और इमाम भी लगा चुके हैं।

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