नई दिल्ली. केन्द्रीय सूचना आयोग में तीन आयुक्तों की नियुक्ति के साथ ही विपक्ष फिर लाल-पीला हो गया है। उसका आरोप है कि सूचना आयुक्तों के चयन के लिए बनाई गई समिति के विरोध को भी दरकिनार कर दिया गया क्योंकि सरकार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर किताब लिखने वाले पत्रकार को आयुक्त जो बनाना था।
सूचना आयोग में तीन नई नियुक्तियां की गई हैं। विदेश सेवा के सेवानिवृत्त अधिकारी यशवर्धन कुमार सिन्हा को प्रमुख सूचना आयुक्त (सीआईसी), सरोज पुन्हानी को डिप्टी सीएजी और पत्रकार उदय माहुरकर को सूचना आयुक्त नियुक्त किया गया है। आयुक्तों को चुनने के लिए बने पैनल के सदस्य कांग्रेस सांसद अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि नियुक्तियां उनके विरोध के बावजूद हुई हैं। चौधरी ने आपत्ति जताई कि चयन समिति ने 139 आवेदकों में से सात को शार्ट लिस्ट करने का कोई भी आधार नहीं बताया।

मुख्य सूचना आयुक्त नियुक्त किए यशवर्धन कुमार सिन्हा 1981 बैच के आईएफएस अधिकारी हैं। वे श्रीलंका और ब्रिटेन में भारत के राजदूत रह चुके हैं और कई और विदेशी दूतावासों में अहम पदों पर काम कर चुके हैं। उन्हें जनवरी 2019 में केंद्रीय सूचना आयुक्त बनाया गया था। चौधरी के अनुसार सिन्हा सीआईसी के पद के लिए इस कारण से भी योग्य नहीं थे क्योंकि सूचना आयुक्त वनजा सरना उनसे वरिष्ठ हैं और पद के लिए बेहतर योग्य हैं।

पत्रकार के नाम पर सबसे बड़ा विवाद

सबसे बड़ा विवाद माहुरकर के नाम को लेकर उठा है। इंडिया टुडे समूह के साथ काम करने वाले माहुरकर को केंद्र में सत्तारूढ़ बीजेपी समर्थक माना जाता है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपलब्धियों पर एक किताब भी लिखी है। अधीर रंजन चौधरी के अनुसार माहुरकर का नाम आवेदकों की सूची में था ही नहीं। यह पहली बार नहीं है जब सूचना आयोग में नियुक्तियों पर विवाद खड़ा हुआ है। लंबे समय तक आयुक्तों के पदों का खाली पड़े रहना और जब नियुक्तियां हों तो उनमें पारदर्शिता का ना होना बार बार सामने आने वाली समस्या है। सूचना आयुक्तों, दूसरे आयुक्तों और यहां तक कि लोकायुक्त की भी नियुक्ति के लिए पूरी तरह से मनमानी भरी प्रक्रिया का इस्तेमाल हो रहा है। इसके लिए सभी राजनीतिक पार्टियां जिम्मेदार हैं क्योंकि हर पार्टी किसी ना किसी राज्य के सूचना आयोगों में लगातार मनमानी नियुक्तियां कर रही है।

सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के अनुसार सर्च समिति के सदस्यों के नाम, शार्ट लिस्ट किए गए आवेदकों के नाम और उन्हें चुने जाने के मानदंडों को संबंधित सरकारी विभाग की वेबसाइट पर डाल देना चाहिए, लेकिन इस आदेश का पालन नहीं हो रहा है। माना जा रहा है कि अगर सूचना आयोग में नियुक्तियों का यही हाल रहा तो सूचना के अधिकार को और नुकसान होगा।

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