नई दिल्ली. जिन तीन कृषि कानूनों के विरोध में किसान दिल्ली की सीमा पर ग्यारह दिन से डटे हुए हैं, उनकी आड़ में विपक्ष ने सरकार पर हमले तेज ​कर दिए हैं। विपक्ष किसान आंदोलन को मोदी सरकार को बैकफुट पर लाने के अवसर के रूप में देख रहा है।
आखिर इन तीन कानूनों में ऐसा क्या है कि किसान भीषण सर्दी में दिल्ली को घेरकर बैठे हैं। इसके लिए मोदी सरकार की ओर से संसद में पारित कराए गए तीनों कानूनों के प्रावधानों को जानने की उत्सुकता हर किसी में हैं। तो जानिए कानूनों के वे प्रावधान जिनका किसान विरोध कर रहे हैं।

कृषक उपज व्‍यापार और वाणिज्‍य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक, 2020

इस क़ानून के तहत किसानों और व्यापारियों को राज्य की एपीएमसी की रजिस्टर्ड मंडियों से बाहर फ़सल बेचने की आज़ादी होगी। फ़सल को एक से दूसरे राज्य में बिना किसी रोक-टोक के बेचने को बढ़ावा दिया जाने का प्रावधान है। जबकि विपक्ष का तर्क है कि इससे राज्यों को राजस्व का नुक़सान होगा। अगर किसान एपीएमसी मंडियों के बाहर फ़सल बेचेंगे तो वे ‘मंडी फ़ीस’ नहीं वसूल पाएंगे। अगर फसलों की बिक्री मंडियों के बाहर चली गई तो कमीशन एजेंटों का क्या होगा? विपक्ष का कहना है कि कानून लागू होते ही सरकार धीरे-धीरे एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) के ज़रिए फ़सल ख़रीद बंद कर देगी।

कृषक (सशक्‍तिकरण व संरक्षण) क़ीमत आश्‍वासन और कृषि सेवा पर क़रार विधेयक, 2020

इस क़ानून में कॉन्ट्रैक्ट फ़ार्मिंग के लिए राष्ट्रीय फ्रेमवर्क बनाने का प्रावधान है। किसान कृषि व्यापार करने वाली फ़र्मों, प्रोसेसर्स, थोक व्यापारी, निर्यातकों या बड़े खुदरा विक्रेताओं के साथ कॉन्ट्रैक्ट करके पहले से तय एक दाम पर भविष्य में अपनी फ़सल बेच सकते हैं। पांच हेक्टेयर से कम ज़मीन वाले छोटे किसान कॉन्ट्रैक्ट से लाभ कमा पाएंगे। बाज़ार की अनिश्चितता के ख़तरे को किसान की जगह कॉन्ट्रैक्ट फ़ार्मिंग करवाने वाले प्रायोजकों पर डाला गया है। अनुबंधित किसानों को गुणवत्ता वाले बीज की आपूर्ति सुनिश्चित, तकनीकी सहायता और फ़सल स्वास्थ्य की निगरानी, ऋण की सुविधा और फ़सल बीमा की सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी। जबकि विपक्ष का कहना है कि कॉन्ट्रैक्ट फ़ार्मिंग में किसान कमज़ोर होगा।
किसी विवाद की स्थिति में बड़ी निजी कंपनी, निर्यातक, थोक व्यापारी या प्रोसेसर को बढत मिलेगी।

आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक 2020

इस क़ानून में अनाज, दलहन, तिलहन, खाद्य तेल, प्‍याज़ और आलू का स्टॉक करने का प्रतिबंध हटा लिया गया है। सिर्फ़ युद्ध जैसी असाधारण परिस्थितियों को छोड़कर जितना चाहे इन वस्तुओं भंडारण किया जा सकता है। क़ानून से निजी सेक्टर का कृषि क्षेत्र में डर कम होगा क्योंकि अत्यधिक क़ानूनी हस्तक्षेप के चलते निजी निवेशक इस खेत्र में आने से डरते थे। इसके अलावा कृषि इन्फ़्रास्ट्रक्चर में निवेश बढ़ेगा, कोल्ड स्टोरेज और फ़ूड स्प्लाई चेन का आधुनिकीकरण होगा। बाजार
प्रतिस्पर्धी बनेगा। जबकि विपक्ष का तर्क है कि असाधारण परिस्थितियों में क़ीमतों में इज़ाफ़ा होगा जिसे नियंत्रित करना मुश्किल होगा। बड़ी कंपनियों को फसलों का अत्यधिक भंडार बनाने का मौका मिलेगा जिसका नुकसान किसानों को होगा।

किसान संगठनों का आरोप है कि नए क़ानून की वजह से कृषि क्षेत्र भी पूँजीपतियों या कॉरपोरेट घरानों के हाथों में चला जाएगा और इसका नुक़सान किसानों को होगा। जिन उत्पादों पर किसानों को एमएसपी नहीं मिलती, उन्हें वो कम दाम पर बेचने को मजबूर हो जाएंगे।

प्रदर्शनकारियों को यह डर है कि एफ़सीआई राज्य की मंडियों से ख़रीद नहीं कर पाएगा। इससे एजेंटों और आढ़तियों को 2.5% के कमीशन का घाटा होगा। राज्य भी अपना छह प्रतिशत कमीशन खो देंगे। इसका सबसे बड़ा नुक़सान आने वाले समय में होगा, जब धीरे-धीरे मंडियां ख़त्म होने लगेंगी। आवश्यक वस्तु संशोधन क़ानून से कालाबाज़ारी को बढ़ावा मिल सकता है। किसानों का कहना है कि सरकार ने जमाखोरी को कानूनी जामा पहना दिया है।

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