नई दिल्ली. मीडिया की सहायता से सिर्फ कोरोना का बाजा बजा रही सरकार को अहसास तक नहीं है कि उसकी इस हिमाकत के चलते देश भर में वे लाखों रोगी मौत के जबड़ों में फंस गए जिन्हें अन्य गम्भीर बीमारियां हैं और अस्पतालों में आउटडोर सेवाएं बंद करने से उन्हें इलाज तक नहीं मिल पा रहा है। इसके अलावा सरकार कोरोना टेस्ट के नाम पर चल रहे कमाई के खेल पर रोक लगाने में भी नाकाम रही है।

ये आरोप किसी सामान्य आदमी ने नहीं बल्कि मोदी सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की स्थायी संसदीय समिति ने राज्यसभा के सभापति एम वेंकैया नायडू को सौंपी अपनी ताजा रिपोर्ट में इनका उल्लेख किया है।

समिति ने कहा कि सरकारी अस्पतालों में ओपीडी सेवाओं को बंद करने से स्वास्थ्य सेवा प्रणाली एकदम निष्क्रिय हो गई और गैर-कोविड मरीजों विशेषकर घातक बीमारी वाले मरीजों को सबसे ज्यादा खामियाजा उठाना पड़ा। समिति ने माना है कि लॉकडाउन के दौरान अस्पतालों के कई विभागों को बंद कर दिए जाने के चलते स्वास्थ्य सुविधाएं चरमरा गई और इसका सबसे ज्यादा नुकसान महिलाओं को उठाना पड़ा।

रिपोर्ट में संसदीय समिति ने इस बात पर सर्वाधिक चिंता जताई कि कम विश्वसनीय टेस्ट किए जा रहे हैं। जांच रिपोर्ट गलत/निगेटिव आने की संभावना काफी अधिक है। सरकार रैपिड एंटीजन, आरटी-पीसीआर और अन्य टेस्ट की सत्यता का पता लगाए, ताकि देश में टेस्टिंग की वास्तविक तस्वीर सामने आ सके।

ऐसे टेस्ट की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए जो ज्यादा से ज्यादा संख्या में सही परिणाम देते हों। टेस्टिंग की सुविधा सिर्फ बड़े जिलों एवं शहरों तक सीमित नहीं रहे। समिति ने कहा कि भारत सरकार नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल-इंटीग्रेटेड डिजीज सर्विलांस प्रोग्राम (एनसीडीसी-आईडीएसपी) का अच्छे ढंग से इस्तेमाल करने में विफल रही।

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