नई दिल्ली. अर्थशास्त्रियों का कहना है कि रसातल में जा रही जिस अर्थव्यवस्था को संवारने की कोशिश में सरकार ने तीसरे आत्मनिर्भर पैकेज की घोषणा की है, वह कम्पनियों को तो राहत देगा लेकिन बाजार में मांग नहीं बढ़ा पाएगा। अर्थव्यवस्था में मूल संकट मांग का है। लोग आवश्यक चीजों के अलावा कुछ नहीं खरीद रहे हैं। हालांकि मांग कुछ हद तक बढ़ी है लेकिन उतनी ही जितनी धनराशि मांग को प्रोत्साहन देने के लिए अर्थव्यवस्था में सरकार ने लगाई थी।
जानकारों का कहना है कि त्योहारों का मौसम होने के बावजूद बाजारों में जितनी भीड़ है, उतनी खरीद-बिक्री नहीं हो रही। सिर्फ टेलीकॉम, फार्मा, आईटी और एफएमसीजी जैसे चुनिंदा क्षेत्रों को छोड़ कर बाकी सबमें गिरावट है।

पैसा ही नहीं तो कहां से खरीदेंगे सम्पत्ति

कुल 2,65,080 करोड़ रुपयों के तीसरे पैकेज में रोजगार सृजन को बढ़ावा, 26 सेक्टरों और संपत्ति खरीदने वालों तथा रियल एस्टेट डेवलपरों को राहत दी गई है। इससे पहले एक लाख सत्तर हजार करोड़ रुपये के प्रथम राहत पैकेज में गरीब और जरूरतमंद लोगों के लिए अतिरिक्त खाद्यान्न, मनरेगा के तहत मिलने वाली मजदूरी में वृद्धि, मजदूरी में बढ़ोतरी, अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्यकर्मियों के लिए बीमा, किसानों, विधवाओं, बुजुर्गों और विकलांगों को धनराशि, गरीबी रेखा से नीचे गुजर करने वाले परिवारों को अगले मुफ्त गैस के सिलेंडर, महिला स्वयंसेवी समूहों को और ज्यादा कोलैटरल मुक्त लोन, भविष्य निधि (प्रॉविडेंट फंड) खातों में सरकार द्वारा योगदान इत्यादि कदम शामिल थे।

मई में पैकेज की लगभग तीन लाख करोड़ रुपए की किस्त आई। इसमें किसानों, प्रवासी श्रमिकों और रेहड़ी-पटरी वालों के साथ ही गरीबों और प्रवासी श्रमिकों को अन्न की मुफ्त आपूर्ति, रेहड़ी-पटरी वालों के लिए आसान लोन, छोटे व्यापारियों को लोन के ब्याज पर दो प्रतिशत की छूट और छोटे और मझोले किसानों के लिए लोन लेने में मदद इत्यादि का उल्लेख था।

वास्तविक राहत की उम्मीद नहीं

इधर सरकार का दावा है कि वह कुल 29,87,641 करोड़ रुपयों के स्टिमुलस कदमों की घोषणा कर चुकी है, जिसमें आत्मनिर्भर पैकेज 3.0 भी शामिल है लेकिन जानकारों का कहना है कि एक तो अर्थव्यवस्था को जो घाटा हुआ, उसकी भरपाई के लिए जितनी रकम के स्टिमुलस पैकेज की आवश्यकता थी, उतनी धनराशि कभी सरकार ने जारी ही नहीं की।
दूसरी बात ये कि जिन कदमों की घोषणा सरकार ने की, उनमें सरकारी खर्च का अनुपात बहुत कम था। ऐसे में इन पैकेजों से वास्तविक राहत मिलने की उम्मीद बहुत कम थी। हालांकि अब जानकार मानते हैं कि अगर तालाबंदी के शुरूआती असर से तुलना करें तो स्थिति में कुछ सुधार जरूर आया है। आरबीआई ने जहां अप्रैल से मई की पहली तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में लगभग 24 प्रतिशत गिरावट का अनुमान लगाया था, वहीं जुलाई से सितंबर की दूसरी तिमाही में लगभग 9 प्रतिशत गिरावट का अनुमान लगाया है। पहली तिमाही में लगभग 45 प्रतिशत की गिरावट थी जो दूसरी तिमाही में थोड़ा संभल कर 30 प्रतिशत पर सिमट गई।

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