राजस्थान कांग्रेस के सत्ता संग्राम ने नया मोड ले लिया है. सितम्बर 2022 के किस्सा कुर्सी का एपिसोड के बाद आलाकमान की सलाह पर बयानबाजी से बच रहे पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट ने कुछ बगावती जाट नेताओं के सहयोग से मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के खिलाफ फिर से मोर्चा खोल दिया है. किसान सम्मेलनों के बहाने खोले गए फ्रंट पर आक्रामक ढंग से खेलने की कोशिश कर रहे पायलट इससे पहले कांग्रेस नेता राहुल गांधी से पंजाब में मिलकर लौटे और उसके बाद उन्होंने खुलकर राज्य सरकार पर ये कहते हुए हमला बोल दिया कि वह पेपर लीक के सरगनाओं को बचा रही है. आर—पार की लड़ाई वाले इस मोर्चे पर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी तुर्की व ​तुर्की पायलट को प्रति उत्तर तो दिया लेकिन उसमें वैसी धार नहीं थी जैसी अक्सर उनके बयानों में होती है.

चूंकि इस बार सचिन पायलट ने राहुल गांधी से मिलने के बाद सरकार की खिलाफत शुरू की है, इसलिए ये माना जा रहा है कि वे भी अब आलाकमान की सलाह को दरकिनार करके खुलकर दो—दो हाथ करना चाहते हैं. कांग्रेस को वर्षों से कवर कर रहे नई दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकारों का कहना है कि इस मामले को गहरे पानी पैठ जैसी भंगिमा में देखेंगे तो सचिन इस वक्त एक ऐसे भंवर में हैं, जिससे निकलने का उनके पास कोई उपाय नहीं है. इसलिए उन्हें बगावती मुद्रा दिखाकर ही आगे का रास्ता बनाना होगा.

असल में 2020 की भाजपा के समर्थन से की गई बगावत विफल होने के बाद सचिन पायलट के कट्टर समर्थक सत्ता के गलियारों से जबरन बाहर फेंक दिए गए. ज​बकि अशोक गहलोत के समर्थक पांचों घी में और सर कडाही में वाली मुद्रा में सत्ता का लजीज स्वाद ले रहे हैं. स्वयं सचिन को भी अपने दोनों पद गंवाकर पैदल हो जाना पड़ा. ये अलग बात है कि ससुर फारुख अब्दुल्ला के हस्तक्षेप से उन्हें कांग्रेस के अब तक के सबसे कमजोर आलाकमान के यहां से माफी मिल गई अन्यथा पार्टी में उनकी बुरी गत होना तय था. इस बीच मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के खेमे ने उनकी पीठ पर गद्दार का टैग भी चिपका दिया.

हालांकि सचिन को गांधी परिवार के कर्णधार राहुल गांधी और उनकी बहन प्रियंका गांधी का सपोर्ट मिलने का दावा उनके समर्थक करते रहे हैं लेकिन ज्योतिरादित्य सिंधिया एपिसोड के बाद राहुल गांधी दोस्ती की अपेक्षा राजनीतिक मजबूरियों को महत्व देने लगे हैं और ये सभी जानते हैं कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत फिलवक्त कांग्रेस की अभी की सबसे बड़ी जरूरत हैं. इसके अलावा सोनिया गांधी का वरदहस्त भी उनकी ताकत का बड़ा स्रोत है.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सचिन के किसान सम्मेलन और उनके मंच से किए जा रहे हमले मुख्यमंत्री की कुर्सी हासिल करने के लिए नहीं बल्कि अक्टूबर—नवम्बर में होने वाले चुनावों के दौरान टिकटों की लड़ाई में हिस्सा बंटाने की रणनीति है. वे किसान सम्मेलनों में गहलोत विरोधी जाट नेताओं के सहयोग से भीड़ जुटाकर आलाकमान पर दवाब बनाए रखना चाहते हैं. इससे एक तरफ उनके समर्थकों को ये लगता रहेगा कि उनका नेता अभी भी लड़ने में सक्षम है और दूसरी ओर आलाकमान को भी ये संकेत पहुंच जाएंगे कि चुनावी संग्राम में पार्टी का सचिन गुट सरकार रिपीट की संभावनाओं को पलीता लगा सकता है. इसलिए उन्हें पुचकार कर रखना ही होगा.

माना जा रहा है कि किसान सम्मेलन भीड़ जुटाते रहे तो सचिन पायलट आलाकमान पर ये दवाब बनाने में सक्षम हो सकते हैं कि उन्हें मल्लिकार्जुन खड़गे की कार्यकारिणी में कोई सम्मानजनक पद दे दिया जाए.

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