नई दिल्ली. भारी मशक्कत के बाद जीती गई गुजरात की वह राज्यसभा सीट अब कांग्रेस के हाथ से निकलना तय माना जा रहा है जिसे कड़ी मशक्कत के बाद कांग्रेस के अहमद पटेल ने 2017 में जीता था। पटेल का पिछले माह निधन हो जाने से अब उनकी सीट पर फिर से चुनाव होगा। उनका कार्यकाल 18 अगस्त, 2023 तक था। चुनाव आयोग ने पटेल के साथ ही एक और राज्यसभा सदस्य अभय भारद्वाज के निधन से खाली हुई सीट पर चुनाव कराने का फैसला किया है।

जानकारी के अनुसार कांग्रेस के लिए पटेल के निधन से खाली हुई सीट जीतना मुश्किल दिख रहा है क्योंकि गुजरात में बीजेपी के 111 विधायक हैं। कांग्रेस के पास सिर्फ 65 विधायक हैं। इस सीट पर चुनाव जीतने के लिए 88 वोट जरूरी हैं और मौजूदा हालात में 88 वोट जुटाना कांग्रेस के लिए टेढ़ी खीर माना जा रहा है। वैसे भी गुजरात में आए दिन उसके विधायक जिस तरह भाजपा के पाले में जा रहे हैं, उसे देखते हुए कांग्रेस ने चुनाव से पहले ही सीट जीतने की उम्मीद छोड़ दी है।

पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के अनुसार गुजरात की ये सीट अब पार्टी की झोली में आती हुई नहीं दिख रही है क्योंकि पटेल को ये सीट जीतने में पसीने आ गए थे। पटेल के नहीं होने से अब गुजरात में उसे चुनाव जिताने लायक एक भी नेता नहीं है।

असल में पटेल ने लम्बा सफर तय करके राजनीतिक मुकाम हासिल किया था। अहमद पटेल राष्ट्रीय राजनीति में पहली बार तब नजर आए, जब राजीव गांधी ने 1985 में उन्हें संसदीय सचिवों में स्थान दिया। राजीव ने अरुण सिंह और ऑस्कर फर्नांडिस के साथ उन्हें अपना संसदीय सचिव बनाया था। पटेल का भाग्य तब बदला, जब कांग्रेस पार्टी की बागडोर सोनिया गांधी ने संभाली। राजीव गांधी की टीम में होना अहमद पटेल को सोनिया गांधी के शुरुआती सालों में बहुत काम आया, क्योंकि सोनिया का मानना था कि वह उदारवाद तथा धर्मनिरपेक्षवाद के कांग्रेस के आधारभूत मूल्यों के प्रति कटिबद्ध हैं, इसलिए पटेल सटीक पसंद साबित हुए।

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